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शफ़ीक़ जौनपुरी

1902 - 1963 | जौनपुर, भारत

ग़ज़ल 9

शेर 5

तुझे हम दोपहर की धूप में देखेंगे ग़ुंचे

अभी शबनम के रोने पर हँसी मालूम होती है

इश्क़ की इब्तिदा तो जानते हैं

इश्क़ की इंतिहा नहीं मालूम

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जला वो शम्अ कि आँधी जिसे बुझा सके

वो नक़्श बन कि ज़माना जिसे मिटा सके

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पुस्तकें 11

Intikhab-e-Ghazliyat Shafeeq Jonpuri

 

1989

Intikhab-e-Kalam-e-Shafeeq Jaunpuri

 

1962

ख़िरमन

 

1964

नय

 

 

Phool Aur Charagh

 

1965

Safeena

 

 

शाना

 

1963

Shafeeq Jaunpuri Shakhsiyat Aur Fan

 

1983

शफ़ीक़ जौनपुरी: एक मुताला

 

2002

Shafeeq Jonpuri

 

1962

चित्र शायरी 1

जला वो शम्अ कि आँधी जिसे बुझा न सके वो नक़्श बन कि ज़माना जिसे मिटा न सके

 

ऑडियो 6

ऐसी नींद आई कि फिर मौत को प्यार आ ही गया

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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