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शफ़ीक़ जौनपुरी

1902 - 1963 | जौनपुर, भारत

शफ़ीक़ जौनपुरी

ग़ज़ल 10

अशआर 5

इश्क़ की इब्तिदा तो जानते हैं

इश्क़ की इंतिहा नहीं मालूम

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तुझे हम दोपहर की धूप में देखेंगे ग़ुंचे

अभी शबनम के रोने पर हँसी मालूम होती है

जला वो शम्अ कि आँधी जिसे बुझा सके

वो नक़्श बन कि ज़माना जिसे मिटा सके

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फ़रेब-ए-रौशनी में आने वालो मैं कहता था

कि बिजली आशियाने की निगहबाँ हो नहीं सकती

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गया था एक दिन लब पर जफ़ाओं का गिला

आज तक जब उन से मिलते हैं तो शरमाते हैं हम

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पुस्तकें 13

चित्र शायरी 1

 

ऑडियो 6

ऐसी नींद आई कि फिर मौत को प्यार आ ही गया

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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