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सुलैमान अरीब

1922 - 1970 | हैदराबाद, भारत

आधुनिक साहित्य के संस्थापक पत्रिका के संपादक।

आधुनिक साहित्य के संस्थापक पत्रिका के संपादक।

ग़ज़ल 15

शेर 2

'अरीब' देखो इतराओ चंद शेरों पर

ग़ज़ल वो फ़न है कि 'ग़ालिब' को तुम सलाम करो

एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया

सब ही नंगे हैं किसे देख के शरमाऊँ मैं

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पुस्तकें 78

ग़ालिब

 

1968

हैदराबाद के शायर

खण्ड-002

1962

Hyderabad Ke Shayar

 

1962

Kadvi Khushboo

 

1973

पास-ए-गरेबाँ

 

1961

Pas-e-Gareban

 

1961

Shumara Number-002,003

1966

Shumara Number-006,007

1966

Shumara Number-001

1965

Shumara Number-002

1965

चित्र शायरी 1

कोई दुश्मन कोई हमदम भी नहीं साथ अपने तू नहीं है तो दो-आलम भी नहीं साथ अपने साथ कुछ दूर तिरे हम भी गए थे लेकिन अब कहाँ जाएँ कि ख़ुद हम भी नहीं साथ अपने वो भी इक वक़्त तक ख़ुर्शीद-ब-कफ़ फिरते थे ये भी इक वक़्त है शबनम भी नहीं साथ अपने नाख़ुन-ए-वक़्त ने कब ज़ख़्म को दहकाया है ऐसे इक वक़्त कि मरहम भी नहीं साथ अपने सामने कितनी सलीबें हैं पए बे-गुनही आज लख़्त-ए-दिल-ए-मर्यम भी नहीं साथ अपने पी के सोचा कि ख़रीदेंगे ग़म-ए-दुनिया भी तय हुए दाम तो दिरहम भी नहीं साथ अपने

 

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