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"Anam" a Nazm By Faraz Ahmad sung By: Sunil Chaudhry अज्ञात
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Aa Kar Ke Meri Kabr Par - Bahadur Shah Zafar अज्ञात
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Aaj phir dil ne kaha aao bhuladen yaaden अज्ञात
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Ab ke uski aankhon mein अज्ञात
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Ab rahiye baith ek jangal mein अज्ञात
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Allama Iqbal Urdu & Farsi Nazam अज्ञात
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Amazing Urdu Naat by Ghulam Muhammad Qasir अज्ञात
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An Evening on Asrar ul Haq Majaz Birth Anniversary by Muzzafar Ali's Rumi Foundation(Lucknow Chapter) अज्ञात
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Apne hone ka hum ehsaas jagaane aae अज्ञात
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Apne markaz se agar door nikal jao ge अज्ञात
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Baat Kar अज्ञात
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Bedam Shah Warsi's 'Hamari Jaan Ho...' sung by Azalea Ray अज्ञात
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Chalo chodo mohabbat jhoot hai अज्ञात
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Dil Ko Jahan Bhar Ke Muhabbat Mein Gham Mile अज्ञात
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Diwali Nazm अज्ञात
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dushmanon ne to dushmani ki hai अज्ञात
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Ibtedaa-e-Zindagi अज्ञात
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Ilahi koi hawa ka अज्ञात
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In Solidarity with Gaza - Ahmed Faraz Nazm अज्ञात
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Is tapish ka hai mazaa dil hi ko haasil अज्ञात
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Jab un se mile अज्ञात
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Jo khayaal the na qayaas the अज्ञात
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Kaee saal guzre kaee saal beete अज्ञात
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Kamla Devi singing Fani Badayuni अज्ञात
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Main jahaan rahoon अज्ञात
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Maine dekha tha un dino mein use अज्ञात
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Mansab to hamein bhi mil sakte the अज्ञात
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Matlabi hain log yahan par, matlabi zamaana अज्ञात
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More Jobna Ka Ubhar Papi Jobna Ka Dekho Zohrabai Ambalewali अज्ञात
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Mughe apne zabt pe naz tha अज्ञात
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Mujhe ab laut jane de अज्ञात
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Mujhe maut di ke hayaat di अज्ञात
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Na samaaton mein tapish ghuleNa samaaton mein tapish ghule अज्ञात
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Phir usi dasht se aa mil le milaale अज्ञात
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Rang mausam ka haraa tha pehle अज्ञात
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Saaye-e-Ahmed-e-Mukhtar Mubarak Bashad - Kalam-e-Bedam Shah Warsi by Ahsan & Adil Hussain Khan अज्ञात
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shauq-e-beintiha na de jana अज्ञात
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Shikast e zarf ko pindaar e rindana nahin kehte अज्ञात
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Shikwa bhi jafa ka kaise karein अज्ञात
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Shouq Se Nakami Ki Badaulat अज्ञात
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Tere pyar ki tamanna अज्ञात
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Teri aankhen अज्ञात
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Tujhse milne ka nahin koi imkaan jaana अज्ञात
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Tum naghma e mah o anjum ho अज्ञात
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Tumhain Dekh K Yaad Aata Hai Mujhay..... Kahin Pehlay Bhe Tum Sy Mila Hu Mein अज्ञात
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Vocal Title: Kis Ne Zarron Ko Uthaya کس نے ذروں کو اٹھایا Lyrics: Pandit Harichand Akhtar अज्ञात
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Ye to uska hi karishma hai अज्ञात
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Yeh nigah e sharm jhuki jhuki अज्ञात
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अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ अज्ञात
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अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा अज्ञात
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अगर है ज़िंदगी इक जश्न तो ना-मेहरबाँ क्यों है अज्ञात
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अगरचे मुझ को जुदाई तिरी गवारा नहीं अज्ञात
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अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है अज्ञात
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अजब हालत हमारी हो गई है अज्ञात
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अज़ल के मुसव्विर से अज्ञात
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अज़ल के मुसव्विर से अज्ञात
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अज़ल के मुसव्विर से अज्ञात
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अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के अज्ञात
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अज्ञात
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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी अज्ञात
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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं अज्ञात
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अपने एहसास से छू कर मुझे संदल कर दो अज्ञात
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अपने घर की खिड़की से मैं आसमान को देखूँगा अज्ञात
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अपने मरकज़ से कट गया हूँ मैं अज्ञात
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अपने सब यार काम कर रहे हैं अज्ञात
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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ अज्ञात
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अपना ख़ाका लगता हूँ अज्ञात
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अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम अज्ञात
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अपनी धुन में रहता हूँ अज्ञात
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अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो अज्ञात
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अपनी मिट्टी को सर-अफ़राज़ नहीं कर सकते अज्ञात
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अपनी हालत का मुझे ध्यान नहीं होता है अज्ञात
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अब ऐसे चाक पर कूज़ा-गरी होती नहीं थी अज्ञात
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अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था अज्ञात
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अब ये सोचूँ तो भँवर ज़ेहन में पड़ जाते हैं अज्ञात
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अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं अज्ञात
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अम्न में हिस्सा छोड़ चुका हूँ अज्ञात
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अल-अर्ज़-ए-लिल्लाह अज्ञात
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अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं अज्ञात
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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए अज्ञात
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आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो अज्ञात
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आख़िर ऐसा क्यों है पापा अज्ञात
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आँखों के साथ उसे मिरा हँसना नहीं पसंद अज्ञात
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आँखों का है क़ुसूर अगर वो अयाँ नहीं अज्ञात
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आँखों में रंग प्यार के भरने लगी हूँ मैं अज्ञात
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आग बहते हुए पानी में लगाने आई अज्ञात
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आज लब-ए-गुहर-फ़िशाँ आप ने वा नहीं किया अज्ञात
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आज़ाद की रग सख़्त है मानिंद-ए-रग-ए-संग अज्ञात
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आदमी पहले तो लाज़िम है कि इंसान बने अज्ञात
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आप की ओर इक नज़र देखा अज्ञात
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आप की ओर इक नज़र देखा अज्ञात
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आप नाहक़ मलाल करते हैं अज्ञात
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आशिक़ जो इस गली का भी मर कर चला गया अज्ञात
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आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के अज्ञात
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक अज्ञात
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इक कर्ब-ए-मुसलसल की सज़ा दें तो किसे दें अज्ञात
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इक ग़ज़ल तो मिरे हाथों से मिसाली हो जाए अज्ञात
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इक हुनर था कमाल था क्या था अज्ञात
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं अज्ञात
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इल्म और दीन अज्ञात
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इश्क़ की गुम-शुदा मंज़िलों में गई अज्ञात
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इश्क़ को अपने लिए समझा असासा दिल का अज्ञात
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इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से अज्ञात
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इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए अज्ञात
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इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ अज्ञात
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इस से पहले कि कहानी से कहानी निकले अज्ञात
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उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम अज्ञात
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उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर अज्ञात
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उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए अज्ञात
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उदास हैं सब पता नहीं घर में क्या हुआ है अज्ञात
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उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी अज्ञात
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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास अज्ञात
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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा अज्ञात
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उस ने हम को गुमान में रक्खा अज्ञात
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एक आईना रू-ब-रू है अभी अज्ञात
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एक गुमाँ का हाल है और फ़क़त गुमाँ में है अज्ञात
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एक पतझड़ सा है लगा मुझ में अज्ञात
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ऐ कू-ए-यार तेरे ज़माने गुज़र गए अज्ञात
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ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो अज्ञात
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ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या अज्ञात
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ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए अज्ञात
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ऐ शरीफ़ इंसानो अज्ञात
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ऐ सुब्ह मैं अब कहाँ रहा हूँ अज्ञात
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ऐश-ए-उम्मीद ही से ख़तरा है अज्ञात
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और क्या चाहिए जीने के लिए अज्ञात
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और क्या चाहिए जीने के लिए अज्ञात
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कुछ को ये ज़िद है कि हम उस को यहीं देखेंगे अज्ञात
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कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई अज्ञात
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क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच अज्ञात
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क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी अज्ञात
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क़दम-क़दम पे तू ऐ राह-रौ क़याम न कर अज्ञात
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कब उस का विसाल चाहिए था अज्ञात
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कब से आधा है माहताब मिरा अज्ञात
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कभी कभी तो बहुत याद आने लगते हो अज्ञात
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कभी कहा न किसी से तिरे फ़साने को अज्ञात
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कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के अज्ञात
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कभी चराग़ कभी रास्ता बदल कर देख अज्ञात
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कभी तक़्सीर जिस ने की ही नहीं अज्ञात
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कभी फूलों से बहलाया गया हूँ अज्ञात
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कभी लगता है ज़र्रे के बराबर है बिसात अपनी अज्ञात
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क्या तुम को इलाज-ए-दिल-ए-शैदा नहीं आता अज्ञात
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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता अज्ञात
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क्या यक़ीं और क्या गुमाँ चुप रह अज्ञात
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क्यों कहीं बैठ के दम लेते नहीं एक घड़ी अज्ञात
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क़रीब मौत खड़ी है ज़रा ठहर जाओ अज्ञात
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करो दाग़-ए-दिल की सदा पासबानी अज्ञात
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कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा अज्ञात
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कली अज्ञात
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क़ुव्वत और दीन अज्ञात
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कैसे जानेगा वो मेरे घर का रस्ता अज्ञात
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कैसा दिल और इस के क्या ग़म जी अज्ञात
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कहूँ तो क्या मैं कहूँ प्यारी प्यारी आँखों को अज्ञात
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कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा अज्ञात
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कहीं बे-ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने अज्ञात
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कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले अज्ञात
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किया क्या ऐ 'सदा' तू ने बता आ कर ज़माने में अज्ञात
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किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता-आहिस्ता अज्ञात
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किस को सुनाएँ और कहें क्या किसी से हम अज्ञात
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किस तरह प्यास को पानी से अलग रक्खा जाए अज्ञात
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किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे अज्ञात
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क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके अज्ञात
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किसी से अहद-ओ-पैमाँ कर न रहियो अज्ञात
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किसी से कोई ख़फ़ा भी नहीं रहा अब तो अज्ञात
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किसी सलीम से जब है कोई ख़ता होती अज्ञात
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कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा अज्ञात
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कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा अज्ञात
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कौन से शौक़ किस हवस का नहीं अज्ञात
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ख़ुद से रिश्ते रहे कहाँ उन के अज्ञात
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ख़ुदा ने हुस्न दिया तुझ को और जमाल दिया अज्ञात
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ख़ुदी की तर्बियत अज्ञात
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ख़ून थूकेगी ज़िंदगी कब तक अज्ञात
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ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी अज्ञात
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खुला जब चमन में कुतुब-ख़ाना-ए-गुल अज्ञात
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ख़्वाब के रंग दिल-ओ-जाँ में सजाए भी गए अज्ञात
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ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में अज्ञात
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ख़ुशामद अज्ञात
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ख़ाक उगाती हैं सूरतें क्या क्या अज्ञात
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गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह अज्ञात
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गदाई अज्ञात
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गुफ़्तुगू जब मुहाल की होगी अज्ञात
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ग़म है बे-माजरा कई दिन से अज्ञात
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ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे अज्ञात
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गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ अज्ञात
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गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था अज्ञात
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गले लगाएँ करें तुम को प्यार ईद के दिन अज्ञात
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गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो अज्ञात
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गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने अज्ञात
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चलते चलते ये गली बे-जान होती जाएगी अज्ञात
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चाँद फिर तारों की उजली रेज़गारी दे गया अज्ञात
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चोट फूलों की छड़ी से भी न क्यों दिल पर लगे अज्ञात
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छुप के उस ने जो ख़ुद-नुमाई की अज्ञात
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छुपता नहीं नक़ाब में जल्वा शबाब का अज्ञात
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छोड़िए आप का इस बात से क्या लेना है अज्ञात
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ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो अज्ञात
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ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर गया कब का अज्ञात
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जग में आ कर इधर उधर देखा अज्ञात
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जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में अज्ञात
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जनाब-ए-शैख़ की हर्ज़ा-सराई जारी है अज्ञात
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जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम अज्ञात
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जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ अज्ञात
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ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया अज्ञात
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ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया अज्ञात
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जबीं पे उन की ये बिंदी का दाग़ क्या कहिए अज्ञात
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ज़र्द मौसम के इक शजर जैसी अज्ञात
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जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है अज्ञात
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जवाब-ए-शिकवा अज्ञात
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जुस्तुजू अज्ञात
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जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने अज्ञात
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जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है अज्ञात
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जहाँ से आ गए हैं उस जहाँ की याद आती है अज्ञात
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जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे अज्ञात
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ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ अज्ञात
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जाने कहाँ गया है वो वो जो अभी यहाँ था अज्ञात
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ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई अज्ञात
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ज़ाहिर तू है तो मैं निहाँ हूँ अज्ञात
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ज़िक्र भी उस से क्या भला मेरा अज्ञात
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ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी अज्ञात
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ज़िंदगानी जब हमें रास आएगी अज्ञात
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ज़िंदगी के सराब भी देखूँ अज्ञात
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जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता अज्ञात
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जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते अज्ञात
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ज़ीस्त उनवान तेरे होने का अज्ञात
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जो आलम-ए-ईजाद में है साहब-ए-ईजाद अज्ञात
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जो चूज़े आशियाने में मरे हैं अज्ञात
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जो ज़िंदगी बची है उसे मत गंवाइये अज्ञात
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जो तेज़ दौड़ते थे बहुत जल्द थक गए अज्ञात
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जो बुत है यहाँ अपनी जा एक ही है अज्ञात
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जो बनेगा वही बनाना है अज्ञात
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जो हुआ 'जौन' वो हुआ भी नहीं अज्ञात
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झुँझलाए हैं लजाए हैं फिर मुस्कुराए हैं अज्ञात
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टूटते जिस्म के महताब बिखर जा मुझ में अज्ञात
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डासना स्टेशन का मुसाफ़िर अज्ञात
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तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा अज्ञात
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तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है अज्ञात
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त'आरुफ़ अज्ञात
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तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा अज्ञात
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तख़्लीक़ अज्ञात
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तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम अज्ञात
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तुझे क्या बताऊँ मैं हम-नशीं मिरी ज़िंदगी का जो हाल है अज्ञात
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तुझ को देखे इक ज़माना हो गया अज्ञात
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तुझ से गिले करूँ तुझे जानाँ मनाऊँ मैं अज्ञात
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तुझ से मिरे ख़ुदा मैं गुज़ारिश करूँ तो क्या अज्ञात
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तुझी को जो याँ जल्वा-फ़रमा न देखा अज्ञात
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तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो अज्ञात
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तुम को देखा तो ये ख़याल आया अज्ञात
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तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए अज्ञात
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तुम से भी अब तो जा चुका हूँ मैं अज्ञात
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तमन्ना के तार अज्ञात
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तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे अज्ञात
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तुम्हारे साथ ये क़िस्सा कभी कभार का है अज्ञात
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तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो अज्ञात
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तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना अज्ञात
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तेरे आगे सर-कशी दिखलाउँगा? अज्ञात
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तेरे आने का इंतिज़ार रहा अज्ञात
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तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं अज्ञात
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तारीफ़ उस ख़ुदा की जिस ने जहाँ बनाया अज्ञात
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तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार अज्ञात
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तिरे आने का धोका सा रहा है अज्ञात
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तिरे ग़ुरूर का हुलिया बिगाड़ डालूँगा अज्ञात
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तिरे नज़दीक आ कर सोचता हूँ अज्ञात
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तिरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है अज्ञात
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तिरी दोस्ती का कमाल था मुझे ख़ौफ़ था न मलाल था अज्ञात
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तिश्नगी ने सराब ही लिक्खा अज्ञात
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दु'आ अज्ञात
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दुख की गुत्थी खोलेंगे अज्ञात
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देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना अज्ञात
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देखो अभी लहू की इक धार चल रही है अज्ञात
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दुनिया में रह के दुनिया में शामिल नहीं हूँ मैं अज्ञात
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दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ अज्ञात
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दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था अज्ञात
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दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर अज्ञात
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दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया अज्ञात
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दसहरा अज्ञात
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दाएरे से निकाल दे कोई अज्ञात
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दाम-ए-तहज़ीब अज्ञात
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दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी अज्ञात
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दिल के आँगन में जो दीवार उठा ली जाए अज्ञात
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दिल के कहने पर चल निकला अज्ञात
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दिल के कहने पर चल निकला अज्ञात
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दिल के कहने पर चल निकला अज्ञात
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दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते अज्ञात
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दिल की हर बात ध्यान में गुज़री अज्ञात
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दिल को दुनिया का है सफ़र दरपेश अज्ञात
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दिल को रोने के लिए आँख में बस पानी है अज्ञात
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दिल ख़ौफ़ में है आलम-ए-फ़ानी को देख कर अज्ञात
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दिल जो इक जाए थी दुनिया हुई आबाद उस में अज्ञात
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दिल जो है आग लगा दूँ उस को अज्ञात
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दिल ने अपनी ज़बाँ का पास किया अज्ञात
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दिल ने किया है क़स्द-ए-सफ़र घर समेट लो अज्ञात
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दिल परेशाँ है क्या किया जाए अज्ञात
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दिल में अब यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं अज्ञात
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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ अज्ञात
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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है अज्ञात
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दिल-ए-बर्बाद को आबाद किया है मैं ने अज्ञात
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दो सितारे अज्ञात
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धूप में जलते हैं तब साया बनता है अज्ञात
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो अज्ञात
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ध्यान में कौन दरिंदा है जो बेदार हुआ अज्ञात
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न आया मज़ा शब की तन्हाइयों में अज्ञात
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न कोई हिज्र न कोई विसाल है शायद अज्ञात
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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना अज्ञात
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न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है अज्ञात
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न तो जुस्तुजू-ए-दवा-ए-दिल न तो चारागर की तलाश है अज्ञात
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न तो दिल का न जाँ का दफ़्तर है अज्ञात
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न पूछ उस की जो अपने अंदर छुपा अज्ञात
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न मीनार महलों की शौकत बचेगी अज्ञात
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नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए अज्ञात
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नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया अज्ञात
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नज़र ने कर दिया ग़ाएब दिखाया दिल ने जो जल्वा अज्ञात
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नफ़रतें दिल से मिटाओ तो कोई बात बने अज्ञात
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नबुव्वत अज्ञात
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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम अज्ञात
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नहीं निबाही ख़ुशी से ग़मी को छोड़ दिया अज्ञात
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नानक अज्ञात
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निगाह ख़ुद पे टिकी थी तो और क्या दिखता अज्ञात
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नींद आई ही नहीं हम को न पूछो कब से अज्ञात
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पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही अज्ञात
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पंजाबी मुसलमान अज्ञात
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पत्ता पत्ता क्यों है दिल अफ़गार इस गुलज़ार का अज्ञात
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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है अज्ञात
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पानी तिरे चश्मों का तड़पता हुआ सीमाब अज्ञात
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पास अपने इक जान है साईं अज्ञात
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पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था अज्ञात
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पी पी के जगमगाए ज़माने गुज़र गए अज्ञात
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फ़ज़ा का हब्स शगूफ़ों को बास क्या देगा अज्ञात
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फ़राख़-दस्त का ये हुस्न-ए-तंग-दस्ती है अज्ञात
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फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है अज्ञात
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फिर भी अपना देश है चंगा अज्ञात
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बू अज्ञात
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बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं अज्ञात
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बज़्म से जब निगार उठता है अज्ञात
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बजा इरशाद फ़रमाया गया है अज्ञात
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बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं अज्ञात
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बद-दिली में बे-क़रारी को क़रार आया तो क्या अज्ञात
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बदन के दीवार-ओ-दर में इक शय सी मर गई है अज्ञात
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बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं अज्ञात
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बन के साया ही सही सात तो होती होगी अज्ञात
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बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते अज्ञात
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बराबर ख़्वाब से चेहरों की हिजरत देखते रहना अज्ञात
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बेवफ़ा मैं भी सही तुझ में वफ़ा भी तो नहीं अज्ञात
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बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या अज्ञात
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बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं अज्ञात
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बात कोई उमीद की मुझ से नहीं कही गई अज्ञात
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बात मेरी कभी सुनी ही नहीं अज्ञात
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बिखर ही जाऊँगा मैं भी हवा उदासी है अज्ञात
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बोलने का नहीं चुप रहने का मन चाहता है अज्ञात
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भटकता फिर रहा हूँ जुस्तुजू बिन अज्ञात
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भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें अज्ञात
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भर दो झोली मिरी या मोहम्मद लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली अज्ञात
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भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ अज्ञात
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मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ अज्ञात
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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से अज्ञात
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मैं छू सकूँ तुझे मेरा ख़याल-ए-ख़ाम है क्या अज्ञात
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मैं जब वजूद के हैरत-कदे से मिल रहा था अज्ञात
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मैं ने पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठाएगा अज्ञात
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मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में अज्ञात
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मैं हूँ हैराँ ये सिलसिला क्या है अज्ञात
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मंज़र शमशान हो गया है अज्ञात
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मंज़र-ए-रुख़्सत-ए-दिलदार भुलाया न गया अज्ञात
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मुझे किसी ने बताया ख़ुदा है मेरे साथ अज्ञात
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मुझ को तो गिर के मरना है अज्ञात
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मुझे ग़रज़ है मिरी जान ग़ुल मचाने से अज्ञात
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मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना अज्ञात
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मुझे वो कुंज-ए-तन्हाई से आख़िर कब निकालेगा अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा अज्ञात
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मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए अज्ञात
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मुतमइन बैठा हूँ ख़ुद को जान कर अज्ञात
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मद्धम हुई तो और निखरती चली गई अज्ञात
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मदरसा अज्ञात
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मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था अज्ञात
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मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा अज्ञात
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मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख अज्ञात
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मरहूम की याद में अज्ञात
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मेरी आँखों में आ गए आँसू अज्ञात
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मेरी आँखों में तिरे प्यार का आँसू आए अज्ञात
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मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं अज्ञात
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मायूस किस लिए हो उठो बात करते हैं अज्ञात
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मियाँ वो जान कतराने लगी है अज्ञात
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मिरे ग़म के लिए इस बज़्म में फ़ुर्सत कहाँ पैदा अज्ञात
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मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं अज्ञात
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मिरे दिल से दिल को मिला कर तो देखो अज्ञात
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मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है अज्ञात
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मिरे हमदम मिरे दोस्त! अज्ञात
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मिरे हमदम मिरे दोस्त! अज्ञात
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मिरी तौबा जो टूटी है शरारत सब फ़ज़ा की है अज्ञात
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मिरी दास्ताँ मुझे ही मिरा दिल सुना के रोए अज्ञात
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मिरी दास्तान-ए-हसरत वो सुना सुना के रोए अज्ञात
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मिल कर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम अज्ञात
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मिलेगा मंज़िल-ए-मक़्सूद का उसी को सुराग़ अज्ञात
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मिलते जुलते हैं यहाँ लोग ज़रूरत के लिए अज्ञात
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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था अज्ञात
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मिली दिल की अपने ख़बर सनम तुझे दिल में जब से बसा लिया अज्ञात
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मोहब्बत और मोहब्बत का शजर बाक़ी रहेगा अज्ञात
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मोहब्बत करने वाले कम न होंगे अज्ञात
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मोहब्बत किस से कब हो जाए अंदाज़ा नहीं होता अज्ञात
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मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है अज्ञात
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मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला अज्ञात
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ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है अज्ञात
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ये कार-ए-ज़िंदगी था तो करना पड़ा मुझे अज्ञात
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ये कौन आ गई दिल-रुबा महकी महकी अज्ञात
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ये ख़बर भी छापिएगा आज के अख़बार में अज्ञात
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ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ अज्ञात
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ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ अज्ञात
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ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ अज्ञात
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ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा अज्ञात
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यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ अज्ञात
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अज्ञात
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ये पैहम तल्ख़-कामी सी रही क्या अज्ञात
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ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो अज्ञात
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ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए अज्ञात
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ये शो'ले आज़माना जानते हैं अज्ञात
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यकुम जनवरी है नया साल है अज्ञात
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या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन अज्ञात
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याद उसे इंतिहाई करते हैं अज्ञात
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यादों का हिसाब रख रहा हूँ अज्ञात
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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे अज्ञात
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रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया अज्ञात
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रुख़्सत हुआ तो बात मिरी मान कर गया अज्ञात
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रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ अज्ञात
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रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ अज्ञात
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रू-ब-रू फिर से उस की आँखें थीं अज्ञात
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रूमी बदले शामी बदले बदला हिंदुस्तान अज्ञात
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रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी अज्ञात
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रह-ए-जुनूँ में चला यूँ मैं उम्र-भर तन्हा अज्ञात
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रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह अज्ञात
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रिंदों को भी मा'लूम हैं सूफ़ी के कमालात अज्ञात
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लगी है चोट जो दिल में उभर आई तो क्या होगा अज्ञात
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लुटा दिए थे कभी जो ख़ज़ाने ढूँढते हैं अज्ञात
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लम्हे लम्हे की ना-रसाई है अज्ञात
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लाख तक़दीर पे रोए कोई रोने वाला अज्ञात
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लाज़िम है अपने आप की इमदाद कुछ करूँ अज्ञात
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लिख दिया अपने दर पे किसी ने इस जगह प्यार करना मना है अज्ञात
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में अज्ञात
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वजूद पर इंहिसार मैं ने नहीं किया था अज्ञात
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वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत अज्ञात
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विदा करता है दिल सतवत-ए-रग-ए-जाँ को अज्ञात
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वो क्या कुछ न करने वाले थे अज्ञात
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वो क्या ज़िंदगी जिस में जोशिश नहीं अज्ञात
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वो जो था वो कभी मिला ही नहीं अज्ञात
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वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा अज्ञात
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वो तो मैं आग जलाने से मियाँ वाक़िफ़ था अज्ञात
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वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला अज्ञात
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वो भूल गया मुझ से बरसों की शनासाई अज्ञात
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वो मज़ा रखते हैं कुछ ताज़ा फ़साने अपने अज्ञात
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वो लब कि जैसे साग़र-ए-सहबा दिखाई दे अज्ञात
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वो हमनशीं था मगर ऐसे ना-शनास रहा अज्ञात
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वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी अज्ञात
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शब वही लेकिन सितारा और है अज्ञात
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शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो अज्ञात
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शमशीर मेरी, मेरी सिपर किस के पास है अज्ञात
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शाम अच्छी है न सहर अच्छी अज्ञात
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शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी अज्ञात
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शाम से आज साँस भारी है अज्ञात
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शाम हुई है यार आए हैं यारों के हमराह चलें अज्ञात
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शौक़ के दफ़्तर दिलों में रह गए अज्ञात
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शौक़-ए-रक़्स से जब तक उँगलियाँ नहीं खुलतीं अज्ञात
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सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम अज्ञात
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सफ़र के ब'अद भी मुझ को सफ़र में रहना है अज्ञात
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सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए अज्ञात
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सब से प्यारा है प्यार का रिश्ता अज्ञात
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सुब्ह अज्ञात
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समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं अज्ञात
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समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा अज्ञात
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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा अज्ञात
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सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं अज्ञात
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सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है अज्ञात
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सर-ए-सहरा हबाब बेचे हैं अज्ञात
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सरमाया-दारी अज्ञात
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सुलगती रेत पे आँखें भी ज़ेर-ए-पा रखना अज्ञात
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सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना अज्ञात
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सहरिश-ए-गुल के इस्ति'आरे हैं अज्ञात
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सहो बेचारगी का दुख अज्ञात
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साक़ी अज्ञात
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सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए'तिबार आप के वा'दे पर कर लिया अज्ञात
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सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप अज्ञात
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सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है अज्ञात
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सितम हो जाए तम्हीद-ए-करम ऐसा भी होता है अज्ञात
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सियासी पेशवा अज्ञात
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सिलसिला यूँ भी रवा रक्खा शनासाई का अज्ञात
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सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा अज्ञात
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सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं अज्ञात
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सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है अज्ञात
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सोचा है कि अब कार-ए-मसीहा न करेंगे अज्ञात
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सोज़-ए-ग़म दे के मुझे उस ने ये इरशाद किया अज्ञात
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सोज़-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ से दिल को बचाए कौन अज्ञात
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है आरज़ू कि और तो क्या ख़ुद ख़ुदा न हो अज्ञात
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है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम किस के दिल को अदाओं से बहलाओगे अज्ञात
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है फ़सीलें उठा रहा मुझ में अज्ञात
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है बिखरने को ये महफ़िल-ए-रंग-ओ-बू तुम कहाँ जाओगे हम कहाँ जाएँगे अज्ञात
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है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी अज्ञात
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हक़ की है गर तलाश तो ये मान कर चलो अज्ञात
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हक़ीक़त-ए-अज़ली है रक़ाबत-ए-अक़्वाम अज्ञात
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हम आँधियों के बन में किसी कारवाँ के थे अज्ञात
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हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते अज्ञात
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हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही अज्ञात
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हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर अज्ञात
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हम तिरा हिज्र मनाने के लिए निकले हैं अज्ञात
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हम तो जैसे वहाँ के थे ही नहीं अज्ञात
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए अज्ञात
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हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है अज्ञात
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हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते अज्ञात
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हमारे बा'द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे अज्ञात
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हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए अज्ञात
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हमारी तहरीरें वारदातें बहुत ज़माने के बाद होंगी अज्ञात
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हयात-ए-अबदी अज्ञात
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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है अज्ञात
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हर तरफ़ यार का तमाशा है अज्ञात
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हर धड़कन हैजानी थी हर ख़ामोशी तूफ़ानी थी अज्ञात
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हर रोज़ जो मर जाने का ए'लान करो हो अज्ञात
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हैरत है जिन्हें मेरी तरक़्क़ी पे जलन भी अज्ञात
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हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए अज्ञात
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हल्क़े में रसूलों के वो माह-ए-मदनी है अज्ञात
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हँसते-हँसते न सही रो के ही कट जाने दो अज्ञात
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हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं अज्ञात
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हुस्न पर जब शबाब आता है अज्ञात
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हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए अज्ञात
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हँसने वाले अब एक काम करें अज्ञात
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हाथ हाथों में न दे बात ही करता जाए अज्ञात
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हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ अज्ञात
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हिज्र की आँखों से आँखें तो मिलाते जाइए अज्ञात
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हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा अज्ञात
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हो जाएगी जब तुम से शनासाई ज़रा और अज्ञात
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अज्ञात
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अज्ञात
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अज्ञात
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1919 की एक बात अज्ञात
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Based on Sadat Hassan Manto's short story "Thanda Gosht" अज्ञात
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Buu अज्ञात
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jab teri samundar aankhon mein अज्ञात
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KHatm hui barish-e-sang अज्ञात
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Khol do अज्ञात
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Khol Do (Photo Story) अज्ञात
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KHuda wo waqt na lae अज्ञात
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kya karen अज्ञात
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lauh-o-qalam अज्ञात
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main tere sapne dekhun अज्ञात
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mere dard ko jo zaban mile अज्ञात
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mere hamdam mere dost अज्ञात
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mere hi lahu par guzar auqat karo ho अज्ञात
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Piran अज्ञात
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shishon ka masiha koi nahin अज्ञात
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tin aawazen - Part 2 अज्ञात
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tum apni karni kar guzro अज्ञात
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Zihaal-e-Miskeen - Sannata Soundtrack अज्ञात
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अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं अज्ञात
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अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं अज्ञात
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अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा अज्ञात
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अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा अज्ञात
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अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए अज्ञात
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अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता अज्ञात
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अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता अज्ञात
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अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता अज्ञात
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अंधा कबाड़ी अज्ञात
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अनार कली अज्ञात
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अपने को तलाश कर रहा हूँ अज्ञात
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अपने सब यार काम कर रहे हैं अज्ञात
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अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को अज्ञात
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अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को अज्ञात
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अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को अज्ञात
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अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए अज्ञात
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अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे अज्ञात
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अपनी धुन में रहता हूँ अज्ञात
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अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ अज्ञात
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अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो अज्ञात
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें अज्ञात
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अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे अज्ञात
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अब तो ये भी नहीं रहा एहसास अज्ञात
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अब्जी डूडू अज्ञात
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अभी इक शोर सा उठा है कहीं अज्ञात
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अभी तो मैं जवान हूँ अज्ञात
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अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम अज्ञात
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अल्लाह दत्ता अज्ञात
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अश्क-ए-रवाँ की नहर है और हम हैं दोस्तो अज्ञात
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असर उस को ज़रा नहीं होता अज्ञात
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असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद अज्ञात
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असली जिन अज्ञात
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आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे अज्ञात
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आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ अज्ञात
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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए अज्ञात
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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए अज्ञात
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आँखें अज्ञात
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आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा अज्ञात
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आख़िरी सल्यूट अज्ञात
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आँखों पर चर्बी अज्ञात
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आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ अज्ञात
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आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए अज्ञात
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आँखों से हया टपके है अंदाज़ तो देखो अज्ञात
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आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता अज्ञात
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आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज जाने की ज़िद न करो अज्ञात
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आज तो बे-सबब उदास है जी अज्ञात
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आप की याद आती रही रात भर अज्ञात
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आप की याद आती रही रात भर अज्ञात
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आप की याद आती रही रात भर अज्ञात
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आप जिन के क़रीब होते हैं अज्ञात
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आप जिन के क़रीब होते हैं अज्ञात
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आप जिन के क़रीब होते हैं अज्ञात
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आप जिन के क़रीब होते हैं अज्ञात
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आम अज्ञात
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आरज़ू है वफ़ा करे कोई अज्ञात
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आर्टिस्ट लोग अज्ञात
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आवारा अज्ञात
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आवारा अज्ञात
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आवारा अज्ञात
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक अज्ञात
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक अज्ञात
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आह जो दिल से निकाली जाएगी अज्ञात
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आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो अज्ञात
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आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो अज्ञात
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इक दानिश-ए-नूरानी इक दानिश-ए-बुरहानी अज्ञात
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
-
इक शहंशाह ने बनवा के.... अज्ञात
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इतना मालूम है! अज्ञात
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इंतिसाब अज्ञात
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इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई अज्ञात
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इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही अज्ञात
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इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ अज्ञात
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इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी अज्ञात
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इसी में ख़ुश हूँ मिरा दुख कोई तो सहता है अज्ञात
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या अज्ञात
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उर्दू अज्ञात
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उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है अज्ञात
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एक ख़त अज्ञात
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एक रह-गुज़र पर अज्ञात
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एक लड़का अज्ञात
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एक साया मिरा मसीहा था अज्ञात
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एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है अज्ञात
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ऐ ज़ब्त देख 'इश्क़ की उन को ख़बर न हो अज्ञात
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औरत ज़ात अज्ञात
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औलाद अज्ञात
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कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया अज्ञात
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कुत्ते अज्ञात
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कुत्ते अज्ञात
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कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई अज्ञात
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कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की अज्ञात
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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में अज्ञात
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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में अज्ञात
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कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से अज्ञात
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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता अज्ञात
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कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा अज्ञात
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कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं अज्ञात
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कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी अज्ञात
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क्या क्या न रंग तेरे तलबगार ला चुके अज्ञात
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क्या करें अज्ञात
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करोगे याद तो हर बात याद आएगी अज्ञात
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कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी अज्ञात
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किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ अज्ञात
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किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे अज्ञात
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किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे अज्ञात
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कोई उम्मीद बर नहीं आती अज्ञात
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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है अज्ञात
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कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे अज्ञात
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कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे अज्ञात
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कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे अज्ञात
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कौन कहता है मोहब्बत की ज़बाँ होती है अज्ञात
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ख़ुदा असर से बचाए इस आस्ताने को अज्ञात
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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं अज्ञात
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खुली आँखों में सपना झाँकता है अज्ञात
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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया अज्ञात
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं अज्ञात
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गुफ़्तुगू (हिन्द पाक दोस्ती के नाम) अज्ञात
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ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता अज्ञात
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गर्द-ए-सफ़र में राह ने देखा नहीं मुझे अज्ञात
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गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर अज्ञात
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गाहे गाहे बस अब यही हो क्या अज्ञात
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया अज्ञात
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घटा है बाग़ है मय है सुबू है जाम है साक़ी अज्ञात
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चंद रोज़ और मिरी जान अज्ञात
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चाँदनी छत पे चल रही होगी अज्ञात
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जड़ें अज्ञात
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जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है अज्ञात
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जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही अज्ञात
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जब रन में सर-बुलंद अली का अलम हुआ अज्ञात
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ज़माना ख़ुदा है अज्ञात
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ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से अज्ञात
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ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर अज्ञात
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ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना अज्ञात
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जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं अज्ञात
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ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ अज्ञात
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ज़िंदगी से डरते हो अज्ञात
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ज़िंदगी से डरते हो अज्ञात
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ज़िंदाँ की एक शाम अज्ञात
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जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो अज्ञात
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जी ही जी में वो जल रही होगी अज्ञात
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जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा अज्ञात
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ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं अज्ञात
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तू अगर सैर को निकले अज्ञात
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तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है अज्ञात
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तू जब मेरे घर आया था अज्ञात
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तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं अज्ञात
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं अज्ञात
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तराना-ए-हिन्दी अज्ञात
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तेरी ख़ुश्बू का पता करती है अज्ञात
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तेरी सूरत जो दिल-नशीं की है अज्ञात
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तस्वीर-ए-दर्द अज्ञात
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तारिक़ की दुआ अज्ञात
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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ अज्ञात
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देख तो दिल कि जाँ से उठता है अज्ञात
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दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ अज्ञात
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दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं अज्ञात
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दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं अज्ञात
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दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं अज्ञात
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दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों अज्ञात
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दिल चुरा कर नज़र चुराई है अज्ञात
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दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं अज्ञात
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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ अज्ञात
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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ अज्ञात
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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है अज्ञात
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दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन अज्ञात
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दो हाथ अज्ञात
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो अज्ञात
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न आते हमें इस में तकरार क्या थी अज्ञात
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न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ अज्ञात
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न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए अज्ञात
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न तख़्त-ओ-ताज में ने लश्कर-ओ-सिपाह में है अज्ञात
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नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में अज्ञात
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नन्ही पुजारन अज्ञात
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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम अज्ञात
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नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं अज्ञात
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नूरा अज्ञात
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नूरा अज्ञात
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निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं अज्ञात
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नींद आँखों से उड़ी फूल से ख़ुश्बू की तरह अज्ञात
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नौ-जवान ख़ातून से अज्ञात
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नौ-जवान से अज्ञात
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परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए अज्ञात
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पाँव से लहू को धो डालो अज्ञात
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फ़र्ज़ करो अज्ञात
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फूल मुरझा गए सारे अज्ञात
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फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर अज्ञात
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फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर अज्ञात
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बे-क़रारी सी बे-क़रारी है अज्ञात
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बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता अज्ञात
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बचनी अज्ञात
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बंजारा-नामा अज्ञात
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बंजारा-नामा अज्ञात
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बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के अज्ञात
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बदसूरती अज्ञात
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बदसूरती अज्ञात
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बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता अज्ञात
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बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता अज्ञात
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बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता अज्ञात
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बर्क़-ए-कलीसा अज्ञात
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना अज्ञात
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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी अज्ञात
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बात मेरी कभी सुनी ही नहीं अज्ञात
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बादशाहत का ख़ात्मा अज्ञात
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बाबू गोपीनाथ अज्ञात
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बारिश अज्ञात
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बिंदराबन के कृष्ण-कन्हैया अल्लाह-हू अज्ञात
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बीमार अज्ञात
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बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है अज्ञात
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भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं अज्ञात
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मआल-ए-सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी देखते जाओ अज्ञात
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मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे अज्ञात
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मुजरिम अज्ञात
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मुझ से ऊँचा तिरा क़द है, हद है अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात
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मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी अज्ञात
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मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख अज्ञात
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मुशीर अज्ञात
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मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का अज्ञात
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मिट्टी का दिया अज्ञात
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मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता अज्ञात
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मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू अज्ञात
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मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है अज्ञात
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मोहब्बत का असर जाता कहाँ है अज्ञात
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मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं अज्ञात
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अज्ञात
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यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा अज्ञात
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रक़्स अज्ञात
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रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म पर आई अज्ञात
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रंग बे-रंग हों ख़ुशबू का भरोसा जाए अज्ञात
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रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी अज्ञात
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रात और रेल अज्ञात
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रात और रेल अज्ञात
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रात के बा'द नए दिन की सहर आएगी अज्ञात
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रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं अज्ञात
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रौशनी मुझ से गुरेज़ाँ है तो शिकवा भी नहीं अज्ञात
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ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें अज्ञात
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ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा अज्ञात
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लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता अज्ञात
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लाओ तो क़त्ल-नामा मिरा अज्ञात
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लिहाफ़ अज्ञात
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वतन का राग अज्ञात
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व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे) अज्ञात
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व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे) अज्ञात
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वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या अज्ञात
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वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या अज्ञात
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वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या अज्ञात
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वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या अज्ञात
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वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे अज्ञात
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वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे अज्ञात
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वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे अज्ञात
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वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे अज्ञात
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वो मजबूरी नहीं थी ये अदाकारी नहीं है अज्ञात
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शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए अज्ञात
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शौक़ से नाकामी की बदौलत कूचा-ए-दिल ही छूट गया अज्ञात
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं अज्ञात
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं अज्ञात
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं अज्ञात
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं अज्ञात
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सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं अज्ञात
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सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ अज्ञात
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सर ही अब फोड़िए नदामत में अज्ञात
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साए अज्ञात
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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं अज्ञात
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सितारों से उलझता जा रहा हूँ अज्ञात
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई अज्ञात
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है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ अज्ञात
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हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़ अज्ञात
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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले अज्ञात
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हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं अज्ञात
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हम ने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर अज्ञात
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हम बाग़-ए-तमन्ना में दिन अपने गुज़ार आए अज्ञात
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हम भी शाइ'र थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं अज्ञात
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हमेशा देर कर देता हूँ अज्ञात
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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है अज्ञात
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हर एक शब यूँही देखेंगी सू-ए-दर आँखें अज्ञात
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हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए अज्ञात
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हार्ट-अटैक अज्ञात
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