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अज्ञात

अज्ञात के शेर

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दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई

लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

जान लेनी थी साफ़ कह देते

क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की

किसी को कैसे बताएँ ज़रूरतें अपनी

मदद मिले मिले आबरू तो जाती है

बेचैन इस क़दर था कि सोया रात भर

पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर

ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए

रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है

लोग काँटों से बच के चलते हैं

मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं

मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी

अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं

दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं

अगर वो पूछ लें हम से तुम्हें किस बात का ग़म है

तो फिर किस बात का ग़म है अगर वो पूछ लें हम से

कोई रंज का लम्हा किसी के पास आए

ख़ुदा करे कि नया साल सब को रास आए

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं

किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

ईद आई तुम आए क्या मज़ा है ईद का

ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़

डरते हैं ज़मीन तिरे आदमी से हम

कुछ ख़ुशियाँ कुछ आँसू दे कर टाल गया

जीवन का इक और सुनहरा साल गया

पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है

दुनिया तिरी आँखों को भी क्या क्या कहे है

दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल

जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल

वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है

हसीन चेहरे की ताबिंदगी मुबारक हो

तुझे ये साल-गिरह की ख़ुशी मुबारक हो

ये तो इक रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है

वर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है

इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाह

बख़्श देना तो तेरी फ़ितरत है

मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा

मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में

उन के होने से बख़्त होते हैं

बाप घर के दरख़्त होते हैं

गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन

बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी

तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं

शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

एक बोसे के तलबगार हैं हम

और माँगें तो गुनहगार हैं हम

घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूँगा

ग़म छुपा कर मिरे माँ बाप कहाँ रखते थे

शाम होते ही चराग़ों को बुझा देता हूँ

दिल ही काफ़ी है तिरी याद में जलने के लिए

माँगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की

शर्मिंदा आज तक हैं मियाँ ज़िंदगी से हम

मौत से क्यूँ इतनी वहशत जान क्यूँ इतनी अज़ीज़

मौत आने के लिए है जान जाने के लिए

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश

ऐश के यार तो अग़्यार भी बन जाते हैं

दोस्त वो हैं जो बुरे वक़्त में काम आते हैं

दिल में तूफ़ान हो गया बरपा

तुम ने जब मुस्कुरा के देख लिया

जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक

उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं

फ़रिश्ते हश्र में पूछेंगे पाक-बाज़ों से

गुनाह क्यूँ किए क्या ख़ुदा ग़फ़ूर था

ये बे-ख़ुदी ये लबों की हँसी मुबारक हो

तुम्हें ये सालगिरह की ख़ुशी मुबारक हो

सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं

अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा

अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ

आज फिर माँ मुझे मारेगी बहुत रोने पर

आज फिर गाँव में आया है खिलौने वाला

जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ

मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ

शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे

दोस्ती ख़्वाब है और ख़्वाब की ता'बीर भी है

रिश्ता-ए-इश्क़ भी है याद की ज़ंजीर भी है

पलकों की हद को तोड़ के दामन पे गिरा

इक अश्क मेरे सब्र की तौहीन कर गया

ज़िंदगी के उदास लम्हों में

बेवफ़ा दोस्त याद आते हैं

क्या मिला तुम को मिरे इश्क़ का चर्चा कर के

तुम भी रुस्वा हुए आख़िर मुझे रुस्वा कर के

बच्चे फ़रेब खा के चटाई पे सो गए

इक माँ उबालती रही पथर तमाम रात

हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही थे

उन को देखा तो ख़ुदा याद आया

ख़ुदा करे ढले धूप तेरे चेहरे की

तमाम उम्र तिरी ज़िंदगी की शाम हो

इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की

उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की