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वहशी कानपुरी

कानपुर, भारत

ग़ज़ल 1

 

शेर 2

शिकस्त-ए-साग़र-ए-दिल की सदाएँ सुन रहा हूँ मैं

ज़रा पूछो तो साक़ी से कि पैमानों पे क्या गुज़री

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घटाएँ ऊदी ऊदी मै-कदा बर-दोश-ए-फ़स्ल-ए-गुल

जाने लग़्ज़िश-ए-तौबा से ईमानों पे क्या गुज़री

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रुबाई 4

 

पुस्तकें 2

Intikhab-e-Kalam-e-Wahshi Kanpuri

 

1997

Suroor-e-Irfan

 

 

 

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