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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो था
सो उस को एक अब्बू नाम का घोड़ा मिला तो था
जौन एलिया
शेर
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश
'इश्क़ को फ़रियाद लाज़िम थी सो वो भी हो चुकी
अल्लामा इक़बाल
शेर
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
मीरज़ा अबुल मुज़फ़्फर ज़फ़र
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