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नज़्म
तौबा-नामा
शह-दरे में आम के पेड़ों पे कोयल की पुकार
डालियों पर सब्ज़ पत्तों सुर्ख़ फूलों का निखार
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
दीवार क़हक़हा
अँधेरी रातों की काली नागिन सियाहियों में चमक रही है
किरन किरन का लहू पिए है तो मस्त है और बहकर रही है
सज्जाद बाक़र रिज़वी
कहानी
आसिफ़ फर्ऱुखी
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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक






