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शेर
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ऐ कि न-शिनासी ख़फ़ी रा अज़ जली हुशियार बाश
ऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश
अल्लामा इक़बाल
शेर
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
मीरज़ा अबुल मुज़फ़्फर ज़फ़र
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नज़्म
अबुल-अला-म'अर्री
कहते हैं कभी गोश्त न खाता था म'अर्री
फल-फूल पे करता था हमेशा गुज़र-औक़ात
अल्लामा इक़बाल
शेर
मिला न घर से निकल कर भी चैन ऐ 'ज़ाहिद'
खुली फ़ज़ा में वही ज़हर था जो घर में था
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
ग़ज़ल
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
हाए क्या बैठे-बिठाए तुझ को ऐ दिल हो गया













