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फ़ना बुलंदशहरी
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नज़्म
काली दीवार
यहीं पे जादू-गर बैठा जब कहीं की डोर हिलाए
हर बस्ती नागा-साकी हीरोशीमा बन जाए
अहमद फ़राज़
नज़्म
बरसात की बहारें
दर दर हवेली वाला हर आन रो रहा है
मुफ़्लिस सो झोपड़े में दिल-शाद सो रहा है














