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नसीम निकहत

1958 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 17

शेर 4

बंजारे हैं रिश्तों की तिजारत नहीं करते

हम लोग दिखावे की मोहब्बत नहीं करते

अपने चेहरे को बदलना तो बहुत मुश्किल है

दिल बहल जाएगा आईना बदल कर देखो

माना कि मैं हज़ार फ़सीलों में क़ैद हूँ

लेकिन कभी ख़ुलूस से मुझ को बुला के देख

पुस्तकें 2

Khwaab Dekhne Walo

 

2002

Urdu Shayari Mein Waqiyat-e-Karbala

 

2013

 

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