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नज़्म
गुफ़्तुगू (हिन्द पाक दोस्ती के नाम)
तीखी नज़रें हों तुर्श अबरू-ए-ख़मदार रहें
बन पड़े जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहें
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
तुम उस काफ़िर का ज़ौक़-ए-बंदगी अब पूछते क्या हो
जिसे ताक़-ए-हरम भी अबरू-ए-ख़मदार हो जाए
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
हाए क्या बैठे-बिठाए तुझ को ऐ दिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
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विषय
ख़ंजर
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ग़ज़ल
काम नज़रों से लिया अबरू-ए-ख़मदार के ब'अद
तीर मारे मुझे उस शोख़ ने तलवार के ब'अद
पुरनम इलाहाबादी
शेर
मैं तो हर हर ख़म-ए-गेसू की तलाशी लूँगा
कि मिरा दिल है तिरे गेसू-ए-ख़मदार के पास
मुबारक अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
गेसू-ए-ख़मदार में अशआ'र-ए-तर की ठंडकें
आतिश-ए-रुख़्सार में क़ल्ब-ए-तपाँ का इल्तिहाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
शम-ए-रुख़सार लिए गेसू-ए-ख़मदार लिए
सब अँधेरों में उजालों में मिरे पास रहो



