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ग़ज़ल
सुना है ज़ख़्मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है
तिरा अरमान ले ऐ क़ातिल-ए-आलम निकलता है
हैरत इलाहाबादी
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कुल्लियात
आया सो आब-ए-तेग़ ही मुझ को चटा गया
था वो बुरिंदा ज़ख़्मों पे मैं ज़ख़्म खा गया
मीर तक़ी मीर
शेर
इक ज़रा तेग़-ए-निगह को जो इशारा हो जाए
आप का नाम हो और काम हमारा हो जाए
मेहदी अली ख़ान ज़की लखनवी
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
नज़्म
जाम-ए-जम के साथ
काटी है उम्र अब्रू-ए-तेग़-ए-दो-दम के साथ
मैं उस के दम के साथ हूँ वो मेरे दम के साथ
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
शेर
ये एहतिजाज अजब है ख़िलाफ़-ए-तेग़-ए-सितम
ज़मीं में जज़्ब नहीं हो रहा है ख़ूँ मेरा












