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ग़ज़ल
साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार
हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है
बासिर सुल्तान काज़मी
शेर
हर इश्क़ के मंज़र में था इक हिज्र का मंज़र
इक वस्ल का मंज़र किसी मंज़र में नहीं था
अक़ील अब्बास जाफ़री
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ग़ज़ल
हर एक की हर पसंद ठहरे हर एक का इंतिख़ाब निकले
हमी को अच्छा बताया सब ने हमी ज़ियादा ख़राब निकले
अक़ील नोमानी
ग़ज़ल
मुज़्तर हूँ किस का तर्ज़-ए-सुख़न से समझ गया
अब ज़िक्र क्या है सामा-ए-आक़िल को थामना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
वो जिंस नहीं ईमान जिसे ले आएँ दुकान-ए-फ़ल्सफ़ा से
ढूँडे से मिलेगी आक़िल को ये क़ुरआँ के सिपारों में
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
ख़ुशामद
बड़े आक़िल बड़े दाना ने निकाला है ये दाम
ख़ूब देखा तो ख़ुशामद ही की आमद है तमाम
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
सड़ी दीवाना सौदाई जो चाहे सो कहे दुनिया
हक़ीक़त-बीं मगर 'मज्ज़ूब' को आक़िल समझते हैं













