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अक़ील अब्बास जाफ़री

1957 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 2

हर इश्क़ के मंज़र में था इक हिज्र का मंज़र

इक वस्ल का मंज़र किसी मंज़र में नहीं था

बस वही अश्क मिरा हासिल-ए-गिर्या है 'अक़ील'

जो मिरे दीदा-ए-नमनाक से बाहर है अभी

 

पुस्तकें 11

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