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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
हाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैं
उम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैं
अल्लामा इक़बाल
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दोहा
हर इक बात में डाले है हिन्दू मुस्लिम की बात
ये ना जाने अल्हड़ गोरी प्रेम है ख़ुद इक ज़ात
जमीलुद्दीन आली
ग़ज़ल
ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग
होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
मिरा इल्हाद तो ख़ैर एक ला'नत था सो है अब तक
मगर इस आलम-ए-वहशत में ईमानों पे क्या गुज़री
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
अक्सर ख़ुश आ जाती हैं
कोई अल्हड़ चेहरा देखूँ मन को वो भा जाता है
अबु बक्र अब्बाद
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-मोहब्बत है और दिल यूँ हाथ से निकला जाता है
जैसे किसी अल्हड़ का आँचल सरका जाए ढलका जाए
नुशूर वाहिदी
नज़्म
हिन्दी इस्लाम
है ज़िंदा फ़क़त वहदत-ए-अफ़्कार से मिल्लत
वहदत हो फ़ना जिस से वो इल्हाम भी इल्हाद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ग़द्दार
अपनी धरती के गले से अपने लिए कोई हिस्सा तलब करना इल्हाद है
और वैसे भी गंदुम तो शैतानियत ही की ईजाद है
आतिफ़ तौक़ीर
ग़ज़ल
कितने अल्हड़ सपने थे जो दूर सहर में टूट गए
कितने हँसमुख चेहरे फ़स्ल-ए-बहाराँ में ग़मनाक हुए
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
हक़-परस्ती की जो मैं ने बुत-परस्ती छोड़ कर
बरहमन कहने लगे इल्हाद का बानी मुझे
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
अमानत
खनकती हैं रसोई घर में अल्हड़ चूड़ियाँ अब तक
भरा की पोलियाँ लाती हैं सर पर बूढ़ियाँ अब तक
वसीम बरेलवी
क़ितआ
कुफ़्र क्या तसलीस क्या इल्हाद क्या इस्लाम क्या
तू बहर-सूरत किसी ज़ंजीर में जकड़ा हुआ











