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नज़्म
दर्द आएगा दबे पाँव
दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल
लाओ सुल्गाओ कोई जोश-ए-ग़ज़ब का अँगार
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
मिरी बस्ती से परे भी मिरे दुश्मन होंगे
पर यहाँ कब कोई अग़्यार का लश्कर उतरा
अहमद फ़राज़
नज़्म
तीन आवाज़ें
फ़स्ल-ए-गुल आएगी नमरूद के अँगार लिए
अब न बरसात में बरसेगी गुहर की बरखा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हिंदी ग़ज़ल
मेरे दो नैनन श्रंगार भरे और उस के हैं अंगार भरे
मेरे मन में कोयल कूके है और उस के मन में काग सखी













