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राग़िब मुरादाबादी

1918 - 2011 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 5

 

शेर 3

जिसे कहते हो तुम इक क़तरा-ए-अश्क

मिरे दिल की मुकम्मल दास्ताँ है

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हक़ीक़त को छुपाया हम से क्या क्या उस के मेक-अप ने

जिसे लैला समझ बैठे थे वो लैला की माँ निकली

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ख़ुदा कातिब की सफ़्फ़ाकी से भी महफ़ूज़ फ़रमाए

अगर नुक़्ता उड़ा दे नाम-ज़द नामर्द हो जाए

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पुस्तकें 4

Ba Huzoor-e-Khatim-ul-Ambiya

 

1985

Madah-e-Rasool

 

1983

Madhat-e-Khair-ul-Bashar

 

 

मिदहत-ए-ख़ैरुल बशर

गालीब की ज़मीनों में 63 नआतें

1979

 

चित्र शायरी 2

जिसे कहते हो तुम इक क़तरा-ए-अश्क मिरे दिल की मुकम्मल दास्ताँ है

जिसे कहते हो तुम इक क़तरा-ए-अश्क मिरे दिल की मुकम्मल दास्ताँ है

 

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