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ग़ज़ल
हमारे हाथ में बच्चों ने तितलियाँ रख दीं
तो अपने हाथ की हम ने भी बर्छियाँ रख दीं
अंश प्रताप सिंह ग़ाफ़िल
नज़्म
मेरा संसार
मुझे भी नई ज़िंदगी का पता लगा
मुझ से ज़ियादा वो ख़ुश हुए आख़िर ये उन का अंश था
अंकिता गर्ग
ग़ज़ल
माना कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा नहीं किया
लेकिन ज़मीर का कभी सौदा नहीं किया
अंश प्रताप सिंह ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
अब दिल को तुम से कोई भी शिकवा नहीं रहा
या'नी हमारे बीच का रिश्ता नहीं रहा
अंश प्रताप सिंह ग़ाफ़िल
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ग़ज़ल
बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तिरा रुस्वा तिरा शाइर तिरा 'इंशा' तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई
बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई








