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ग़ज़ल
दिए जलते हैं, बुझते हैं, मिरे अतराफ़ में और मैं
बस इक साए के पीछे भागता रहता हूँ बारिश में
ख़ालिद मोईन
नज़्म
मदह
अब तक कोई अंजाम को पहुँची नहीं तदबीर
अतराफ़-ए-वतन में हुआ हक़ बात का शोहरा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
नींद का फ़रिश्ता
ज़मीं अतराफ़ की काली हुई जलने लगे देवे
हवाएँ ख़ुश्क पत्तों को गिरा कर सो गईं शायद
सरवत हुसैन
ग़ज़ल
इसी बाइ'स मैं अपना निस्फ़ रखता हूँ अँधेरे में
मिरे अतराफ़ भी सूरज कोई गर्दिश में रहता है














