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ग़ज़ल
हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
इस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम है
था जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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विषय
बरहम
बरहम शायरी
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ग़ज़ल
जौन एलिया
नज़्म
लौह-ओ-क़लम
असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे
वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तुझे क्या ख़बर मिरे बे-ख़बर मिरा सिलसिला कोई और है
जो मुझी को मुझ से बहम करे वो गुरेज़-पा कोई और है
नसीर तुराबी
ग़ज़ल
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
दीदा ओ दिल को सँभालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़
साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
शम् ओ परवाना न महफ़िल में हों बाहम ज़िन्हार
शम्अ'-रू ने मुझे भेजे हैं ये परवाने दो








