aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "black"
माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवसज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किए हुए
बनेगा मेहर-ए-क़यामत भी एक ख़ाल-ए-सियाहजो चेहरा 'दाग़'-ए-सियह-रू ने आश्कार किया
हमेशा रंग-ए-ज़माना बदलता रहता हैसफ़ेद रंग हैं आख़िर सियाह मू करते
ब्लैक वर्ड्स पब्लिकेशंस
पर्काशक
परमानेंट ब्लैक, दिल्ली
बलैक डायमंड पब्लिशिंग हाउस, धनबाद
विलियम ब्लेक
1757 - 1827
लेखक
ख़्वाजा मोहम्मद बलाक़ काशानी निज़ामी
मुंशी बालक राम
बलेकी बहादुर
बलाकीराम पांडे
मुहम्मद बुल्लाक़
उर्दू पेपर बैक, हैदराबाद
यूनाइटेड ब्लॉक प्रिंटर्स, लखनऊ
बालक किताब घर, नई दिल्ली
बे-बाक पब्लिशिंग हाउस, मालेगाँव
गोल्डन ब्लॉक वर्क्स लिमिटेड, कराची
बी-155, ब्लॉक-5, गुलशन इक़बाल, कराची
आँखें ब्लैक-एण्ड-वाइट हैं तो फिर इन में क्यूँरंग-बिरंगे ख़्वाब कहाँ से आते हैं
जब से बे-नूर हुई हैं शमएँख़ाक में ढूँढता फिरता हूँ न जाने किस जाखो गई हैं मिरी दोनों आँखेंतुम जो वाक़िफ़ हो बताओ कोई पहचान मिरीइस तरह है कि हर इक रग में उतर आया हैमौज-दर-मौज किसी ज़हर का क़ातिल दरियातेरा अरमान, तिरी याद लिए जान मिरीजाने किस मौज में ग़लताँ है कहाँ दिल मेराएक पल ठहरो कि उस पार किसी दुनिया सेबर्क़ आए मिरी जानिब यद-ए-बैज़ा ले करऔर मिरी आँखों के गुम-गश्ता गुहरजाम-ए-ज़ुल्मत से सियह-मस्तनई आँखों के शब-ताब गुहरलौटा देएक पल ठहरो कि दरिया का कहीं पाट लगेऔर नया दिल मेराज़हर में धुल के, फ़ना हो केकिसी घाट लगेफिर पए-नज़्र नए दीदा ओ दिल ले के चलूँहुस्न की मदह करूँ शौक़ का मज़मून लिक्खूँ
“मर्दुम चश्म” (यानी आँख की पुतली, जो काली होती है) और “काली” में मुनासिबत ज़ाहिर है। लेकिन “काली” में ईहाम भी है, कि इसके एक मअनी हैं black जो क़रीब के मअनी हैं और दूसरे मअनी हैं “काले रंग वालों की”, ये बईद मअनी हैं और यही मअनी शायर ने...
نرول رومانی انگ کی پہلی بھرپور صورت مسز عبدالقادر (اصل نام، غلام زینب خاتون) کے افسانے ہیں۔ مسز عبدالقادر کا پہلا افسانہ ’’لاشوں کا شہر‘‘ لگ بھگ 1920ءکی تخلیق ہے۔ یوں ’’لاشوں کا شہر‘‘ سے افسانہ ’’صدائے جرس‘‘ تک ان کے افسانوں پر امریکی ناول نگار اور افسانہ نگار ایڈگرایلن...
رسل نے بتایا ہے کہ الفاظ کی کارفرمائی صرف ان حقائق کو واضح کرنے تک محدود نہیں ہوتی جو ان کے ذریعہ ہمارے سامنے آتے ہیں۔ زبان کو اس کے معنی سے الگ کرکے سمجھنے کی کوشش کرنا بے فائدہ ہے اور کسی لفظ کے ایک متعین معنی ہونے کے...
नेक इरादों के साथ किसी की ख़ुशी, किसी की भलाई के लिए कुछ करना, वो ख़ूबी है जो कम लोगों में होती है, यूँ तो एहसास जताने वाले हज़ारों होते हैं। किसी के एहसास को याद रखना और उस याद को लफ़्ज़ देना हुस्न और इश्क़ दोनों के लिए आज़माइश की घड़ी होती है। एहसास शायरी के इस गुलदस्ते में आपके लिए बहुत कुछ मौजूद हैः
गुज़रे हुए दिनों को याद करके छा जाने वाली उदासी कुछ मीठी सी होती। उस का ज़ायक़ा तो आपने चखा ही होगा। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए जो हम में से हर शख़्स के माज़ी की बा-ज़दीद करता है और गुज़रे हुए लम्हों की यादों को ज़िंदा करता है।
मय-कशी पर शायरी मौज़ूआती तौर पर बहुत मुतनव्वे है। इस में मय-कशी की हालत के तजुर्बात और कैफ़ियतों का बयान भी है और मय-कशी को लेकर ज़ाहिद-ओ-नासेह से रिवायती छेड़-छाड़ भी। इस शायरी में मय-कशों के लिए भी कई दिल-चस्प पहलू हैं। हमारे इस इन्तिख़ाब को पढ़िए और लुत्फ़ उठाइये।
blackblack
भयानक
बालकبالَک
लड़का, पुत्र, बेटा
बिलकبِلک
cry
अलकاَلَک
उन छल्लों में से हर एक जो बालों में पड़ जाते हैं, घूँगर
Black Shirt
मुंशी तीरथ राम फ़िरोज़पुरी
नॉवेल / उपन्यास
ब्लैक होल
अलीम ताहिर
Black Box
कश्मीरी लाल ज़ाकिर
Black Spot
असरार अहमद
जासूसी
Black Sunday
ज़हीर अनवर
नाटक / ड्रामा
Black Hole
मुहम्मद मुज़फ़्फ़रुद्दीन फ़ारूक़ी
ड्रामा
Black Mailer Ka Qatl
जेम्स हेडली चेज़
Black Shirt Ki Wapsi
Black Mailer
जमुना दास अख़्तर
Black And White
ताहिर अंजुम सिद्दीक़ी
अफ़साना
Black Wolf Organization
हुमायूँ इक़बाल
Black Cat
फ़िल्मी-नग़्मे
Black Lord
Shumara Number-060
हारुन बी. ए.
Sep 2011बेबाक
तू ही कह दे कि तिरा हुस्न निखारा किस नेइस ब्लैक-आउट से मुखड़े को सँवारा किस ने
ज़िंदगीइतनी सादा भी नहीं कि एक ब्लैक-एण्ड-वाइट टी-वी-सेटउस के रंगों का अहाता कर सकेमगर रंगीन-सेट भी तो शाइराना मुबालग़े से काम लेते हैंहो सकता है पॉकेट-भर हयात में सात पॉकेट रंगउँडेलने वालों की हक़ीक़ी ज़िंदगी यही होरूह और ज़मीर की उम्र-भर की कमाई सियाह रंग की पुड़िया हैकिसी फ़ाहिशा के बदन से उड़ते हुए लम्हे काधनक-भर मुआवज़ा तो नहींमाहेरीन गिरानी और गुनाह में तनासुब-ए-माकूस नहीं मानतेतो आओ ज़िंदगी को इन्ही निगेटीव्ज़ में देखें
اسی طرح فراق صاحب نے دوسرے مشہور اور انفرادیت پرست شاعر ولیم بلیک (William Black) کی ایک مشہور نظم کا تقریباً ترجمہ ہی اپنی نظم ’’جگنو‘‘ میں کر دیا ہے۔ جہاں بلیک کہتا ہے کہ تم ازل وابد کو اپنی ہتھیلی میں اٹھا سکتے ہو۔ پروٹسٹنٹ اخلاقیات پر رومانی بلند...
استاد میر علی پنجہ کش ہزار تیس مار خاں رہے ہوں، لیکن وہ ایک بہت ہی محدود فن کے دائرے میں بند تھے۔ عشرت قطرہ ہے دریا میں فنا ہو جانا، لیکن قطرہ خود تو دریا نہیں بن سکتا۔ پنجہ کشی یا گلی ڈنڈے کو آپ کتنی ہی دور کیوں...
क़ब्र है या ब्लैक-होल कोईजो गया लौट कर नहीं आया
मैं ने उस को छुपा के रक्खा हैब्लैक आउट में रौशनी की तरह
एक दिन अख़बार में कुछ यूँ ख़बर थी बेश-ओ-कमएक घर में एक ही दिन सात बच्चों का जनमइस अजूबा पर हज़ारों तब्सिरे होने लगेजितने ग़ैरत-दार कुत्ते थे वो सब रोने लगेशिद्दत-ए-ग़म से हर इक कुत्ते को तप चढ़ने लगाबोले अब इंसाँ हमारी हम-सरी करने लगाएक कुत्ता तो यहाँ तक कह गया जज़्बात मेंक्या हिमाक़त की है इस ने आज के हालात मेंजब कि सारी क़ौम के आगे है रोटी का सवालआज ही के दौर में इस को दिखाना था कमालइस को लेना था जो हम कुत्तों की सोहबत का असरऔर भी कुछ ख़ूबियाँ थीं उन पे करनी थी नज़रसब से पहले ये उसूल-ए-ज़िंदगानी सीखताकिस तरह होती है घर की पासबानी सीखतासब से पहले हम से लेना था इसे दर्स-ए-वफ़ाआज तक ये जिस से बे-बहरा है और ना-आश्नाफ़क्र-ओ-फ़ाक़ा सीखता लेता क़नाअत का सबक़हम से पहले इस को लेना था मोहब्बत का सबक़मुतमइन हैं ग़ैर इस से और न ख़ुद इस के अज़ीज़हम कि रखते हैं सदा अपने पराए की तमीज़ये जिसे भी मारता है मारता है बन के यारहम किसी पर भी नहीं करते कभी चुपके से वारहम छुपाते हैं न काला धन न करते हैं ब्लैकहम मुसलमाँ हैं न हिन्दू, है हमारा धर्म एकहम किसी का भी नमक खा कर नहीं करते हरामब मुसलमाँ अल्लाह अल्लाह या बरहमन राम रामहम कि मय-नोशी ही करते हैं न हम पीते हैं भंगहम में हड्डी डाल कर इंसान करवाता है जंगफिर भी अपनी जंग को हम मुस्तक़िल करते नहींउस की तरह मुद्दतों कश्मीर में लड़ते नहींअशरफ़-ए-मख़्लूक़ कैसे पड़ गया था इस का नामक्या नहीं ऐ साथियो! ये डूब मरने का मक़ामये करे चोरी पता हम से लगाती है पुलिसहम बताते हैं तो उस को खींच लाती है पुलिसकौन सी फिर फ़ौक़ियत है आज के इंसान मेंहम से आगे कब ये पहुँचा है किसी मैदान मेंहर मुसीबत हर बला में इस से पहले हम गएइंतिहा ये है ख़ला में इस से पहले हम गएहम भी होते हैं कभी फ़ितरी तक़ाज़ों के शिकारसिंफ़-ए-नाज़ुक को मगर रखते नहीं सर पे सवारइक हमारे वास्ते क़ुदरत ने रक्खा है निज़ामरात दिन हम नस्ल-साज़ी का नहीं करते हैं कामबात क्या सोची हमें नीचा दिखाने के लिएहिर्स भी करने चला बच्चे बनाने के लिए
बम्बई में 'आम है हर जिंस-ए-बेहतर का ब्लैकआरज़ू का वक़्त का संगम का लीडर का ब्लैकयाँ शकील ओ साहिर ओ मजरूह ओ अख़्तर का ब्लैकजा'फ़री तो जा'फ़री ठहरे मुज़फ़्फ़र का ब्लैकदेख कर इस शहर के अंदाज़ दिल हैरान हैबम्बई काहे को है पूरा जमालिस्तान है
बदन पर है डाँबर तो होंटों पे लालीब्लैक और टेकनी कलर फ़िफ़्टी फ़िफ़्टी
जंग के दिनों मेंलोग धमाके और शोरपड़ोसी और जासूस मेंफ़र्क़ करना भूल जाते हैंख़ंदक़ घर में बदल जाती हैऔर रौशनी ब्लैक-आउट बन जाती हैअख़बार तारीख़ लिखते हैंऔर मौत हर जगह अपना नाम
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