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ग़ज़ल
दिल-बस्तगी सी है किसी ज़ुल्फ़-ए-दुता के साथ
पाला पड़ा है हम को ख़ुदा किस बला के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मिरी निगाहों में दोनों जहाँ हुए तारीक
ये आप खोल के ज़ुल्फ़-ए-दुता किधर को चले
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
ये क्यूँ ख़मीदा है सिफ़त-ए-साहब-ए-रुकू
क्या पढ़ रही है दोश पे ज़ुल्फ़-ए-दुता नमाज़
अहमद हुसैन माइल
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ग़ज़ल
अभी अधूरे हैं गीत मेरे अभी अधूरी सी दास्ताँ है
न चाँद निकला न तारे दमके न मुस्कुराती वो कहकशाँ है
दत्ता साग़र
ग़ज़ल
कौन पहनेगा गले में तिरी उल्फ़त की कमंद
किस के सर होगी तिरी ज़ुल्फ़-ए-दुता मेरे बा'द
बासित भोपाली
ग़ज़ल
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
कर के कौनैन को ज़ंजीरी-ए-गेसू-ए-दराज़
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ को दुता करते हो क्या करते हो
मुज़फ़्फ़र शिकोह
ग़ज़ल
शक्ल-ए-'असा-ए-मूसवी था तो वो गेसू-ए-दराज़
पर उसे दस्त-ए-शाना ने दे के ख़म और दुता किया
शाह नसीर
ग़ज़ल
झुक गया वो शह-ए-हुस्न आ के गदा से पहले
ख़म हुई ज़ुल्फ़-ए-दुता क़द्द-ए-दोता से पहले
मीर कल्लू अर्श
ग़ज़ल
देता है क्यों फ़रेब कि मैं भेद पा गया
मुझ पर करम ग़लत है 'अदू पर सितम ग़लत







