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ग़ज़ल
दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार
इस चराग़ाँ का करूँ क्या कार-फ़रमा जल गया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रात और दिन के बीच कहीं पर जागे सोए रस्तों में
मैं तुम से इक बात कहूँगा तुम भी कुछ फ़रमा देना
रईस फ़रोग़
नअत
अहमद रज़ा खां बरेलवी
शेर
तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए
इस सई-ए-करम को क्या कहिए बहला भी गए तड़पा भी गए
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
कभी जो पर्दा-ए-बे-सूरती में जल्वा-फ़रमा थे
उन्हीं को आलम-ए-सूरत में देखा बे-हिजाबाना
बेदम शाह वारसी
क़ितआ
वा'ज़ में फ़रमा दिया कल आप ने ये साफ़ साफ़
पर्दा आख़िर किस से हो जब मर्द ही ज़न हो गए
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वक़्त है गर बुलबुल-ए-मिस्कीं ज़ुलेख़ाई करे
यूसुफ़-ए-गुल जल्वा-फ़रमा है ब-बाज़ार-ए-चमन
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
किसी ने बर्छियाँ मारीं किसी ने तीर मारे हैं
ख़ुदा रक्खे इन्हें ये सब करम-फ़रमा हमारे हैं













