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शेर
साक़ी मय-ख़ाना का गर कम-दही पर है मिज़ाज
हम भी यक फ़िंजाँ बना लेवेंगे साग़र तोड़ कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
कहानी चलती रहती है
कोई दरबार में शतरंज के मोहरे बिछा कर
रेशमी फ़िंजान में ज़हराब भरता है
जावेद हुमायूँ
ग़ज़ल
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
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नज़्म
मुहासरा
वो बर्क़ लहर बुझा दी गई है जिस की तपिश
वजूद-ए-ख़ाक में आतिश-फ़िशाँ जगाती थी
अहमद फ़राज़
नज़्म
ए'तिराफ़
मेरी हर फ़तह में है एक हज़ीमत पिन्हाँ
हर मसर्रत में है राज़-ए-ग़म-ओ-हसरत पिन्हाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
ग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरे
तू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सितम के रंग हैं हर इल्तिफ़ात-ए-पिन्हाँ में
करम-नुमा हैं तिरे जौर सर-ब-सर फिर भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
महफ़िल में तुम अग़्यार को दुज़-दीदा नज़र से
मंज़ूर है पिन्हाँ न रहे राज़ तो देखो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
तुम को भी हम दिखाएँ कि मजनूँ ने क्या किया
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
और ख़ाकिस्तर से आप अपना जहाँ पैदा करे
ज़िंदगी की क़ूव्वत-ए-पिन्हाँ को कर दे आश्कार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लेनिन
वो क़ौम कि फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूम
हद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारात











