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ग़ज़ल
अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं
तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौमें फ़िरक़े ज़ात लिखूँ
जावेद अख़्तर
कुल्लियात
हम फ़क़ीरों को कुछ आज़ार तुम्हीं देते हो
यूँ तो इस फ़िरक़े से सब लोग दुआ लेते हैं
मीर तक़ी मीर
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कुल्लियात
कि बेहतर है 'अयादत और उन्हें बीमार कहते हैं
'अजब होते हैं शा'इर भी मैं उस फ़िरक़े का 'आशिक़ हूँ
मीर तक़ी मीर
नज़्म
ज़बाँ से नफ़रत क्यूँ
हर इक ज़बान को यारो सलाम करते चलो
गिरोह की है न फ़िरक़े की और न मज़हब की
नाज़िश प्रतापगढ़ी
ग़ज़ल
यार हम दो मुख़्तलिफ़ दुनियाओं के तशरीह गर
तू किसी फ़िरक़े का शाइ'र मैं लिसान-ए-किर्दगार
अहमद जहाँगीर
नज़्म
मैं क्या चाहता हूँ
वो फ़िरक़े जो रहते हैं हिन्दोस्ताँ में
उन्हें एक दिल देखना चाहता हूँ
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
ग़ज़ल
इज़्ज़त-ए-नफ़्स का मुश्किल है तहफ़्फ़ुज़ या'नी
एक फ़िरक़े को यहाँ जंग-ओ-जदल चाहिए है
सरफ़राज़ ख़ान आज़मी
ग़ज़ल
जिस वक़्त तू ने फ़र्त-ए-मोहब्बत में अपना आप
गर्द-ए-रह-ए-तलब में मिटाया तो हम हुए








