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ग़ज़ल
दोस्ती का भी तुझे पास न आया हे हे
तू ने दुश्मन से किया मेरा गिला मेरे बा'द
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
चली अब गुल के हाथों से लुटा कर कारवाँ अपना
न छोड़ा हाए बुलबुल ने चमन में कुछ निशाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
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ग़ज़ल
याद आता है वो हर्फ़ों का उठाना अब तक
जीम के पेट में एक नुक्ता है और ख़ाली हे
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
तंज़-ओ-मज़ाह
‘He asked me with his eyes, Yes, and with his hands, Yes, and Yes, I said, Yes, I will, Yes!’...






