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नज़्म
तीन आवाज़ें
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
हम मछेरों से पूछो समुंदर नहीं है ये 'इफ़रीत है
तुम ने क्या सोच कर साहिलों से बंधी कश्तियाँ खोल दीं
तहज़ीब हाफ़ी
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नज़्म
अदम का ख़ला
हर इक जगह वक़्त एक इफ़रीत की तरह यूँ खड़ा हुआ है
कि जैसे वो काएनात का अक्स-ए-बे-कराँ हो
मीराजी
नज़्म
तुम्हारा शहर
मगर ये क्या है कि हर कूचा आज वीराँ है
गली गली में हैं फ़ौलाद-पा सियह इफ़रीत
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
गूँगी औरत
दिन पर दिन इफ़रीत की सूरत में बढ़ता जाता है
इन आवाज़ों की हैबत-नाकी पर वावैला करती
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
ज़ुल्म के इफ़रीत ने शहरों को वीराँ कर दिया
यूँ तो बर्बादी जहाँ में इब्तिदा से कम न थी
ख़याल अमरोहवी
नज़्म
जंग
इफ़रीत-ए-सीम-ओ-ज़र के कलेजे में क्यूँ है फाँस
क्यूँ रुक रही है सीने में तहज़ीब-ए-नौ की साँस













