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शेर
वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है
मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में
चकबस्त बृज नारायण
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ग़ज़ल
सूफ़ी ये सहव महव हुए सद्द-ए-बाब-ए-उंस
क्या इम्बिसात कार-गह-ए-हसत-ओ-बूद में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में
कि ज़ेवर हो गया तौक़-ए-ग़ुलामी अपनी गर्दन में
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
फ़बेअय्ये आलाए रब्बिकमा तुकज़्ज़िबान
सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं
चाहे उन का बुर्ज कोई हो
परवीन शाकिर
नज़्म
पंद्रह अगस्त
आज़ादी-ए-वतन पे हुए हैं कई निसार
ख़ातिर में इन को लाओ कि पंद्रह अगस्त है
मफ़तूं कोटवी
नज़्म
एक शाएरा की शादी पर
ऐ कि था उन्स तुझे इश्क़ के अफ़्सानों से
ज़िंदगानी तिरी आबाद थी रूमानों से
अख़्तर शीरानी
नज़्म
औरत
देख कर ये इक़्तिबास-ए-कार-गाह-ए-इंस-ओ-जाँ
कार-पर्दाज़ान-ए-क़ुदरत में हुईं सरगोशियाँ
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
यक़ीनन है कोई माह-ए-मुनव्वर पीछे चिलमन के
कि उस की पुतलियों से आ रहा है नूर छन छन के














