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ग़ज़ल
ज़रा तक़दीर की गहराइयों में डूब जा तू भी
कि इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शाएर लोग
दुख-भरी ख़ल्क़ का दुख-भरा दिल हैं हम
तब्अ-ए-शाएर है जंगाह-ए-अद्ल-ओ-सितम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शायरी के अनुवाद
आज से बारा बरस पहले बड़ा भाई मिरा
स्टालिनग्राड की जंगाह में काम आया था
रसूल हम्ज़ातोव
ग़ज़ल
कौन हम को जानता था उस जगह फिर भी मगर
सब से पीछे छुप के बज़्म-ए-शाह में बैठे थे हम
नासिरा ज़ुबेरी
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ग़ज़ल
बदल जाएगा मेरा घर भी सहरा में किसी दिन
अगर मैं दश्त ही में ज़िंदगी करता रहूँगा
मिद्हत-उल-अख़्तर
ग़ज़ल
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो
बशीर बद्र
नज़्म
शिकवा
हम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिए
और मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिए
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
अहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन है
ऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कभी कभी
भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर




