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नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
ज़ुल्मों की जफ़ाओं की आहों की कराहों की
हैं ग़म से हज़ीं ले चल!
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
सारे-जहाँ को दिल से भुलाता रहा हूँ मैं
बस याद तेरी दिल में बसाता रहा हूँ मैं
अर्पित शर्मा अर्पित
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ग़ज़ल
जफ़ाओं के गिले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं
मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
जफ़ाओं की नुमाइश है किसी से कुछ नहीं बोलें
सितमगर की सताइश है किसी से कुछ नहीं बोलें














