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नज़्म
आदमी-नामा
नमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमला
ये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्या
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
शहरों मुल्कों में जो ये 'मीर' कहाता है मियाँ
दीदनी है पे बहुत कम नज़र आता है मियाँ
मीर तक़ी मीर
मर्सिया
जो सानी-ए-महबूब-ए-इलाही है कहाता
इक नूर जो जाता है तो इक नूर है आता
मीर मुज़फ़्फ़र हुसैन ज़मीर
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ग़ज़ल
कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
बशीर बद्र
ग़ज़ल
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई
बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई




