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ग़ज़ल
यहाँ क्यों लोग इस सच्चाई से अंजान होते हैं
कि अच्छे कर्म ही इंसान की पहचान होते हैं
धर्वेन्द्र सिंह बेदार
ग़ज़ल
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे









