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ग़ज़ल
'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़
उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़
तहज़ीब हाफ़ी
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ग़ज़ल
अनवर मिर्ज़ापुरी
नज़्म
होली की बहारें
उस खींचा-खींच घसीटी पर भड़वे रंडी का फक्कड़ हो
माजून, शराबें, नाच, मज़ा, और टिकिया सुल्फ़ा कक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
मीर तक़ी मीर
नज़्म
इसी दो-राहे पर
मैं खिंचा तुझ से मगर तू मिरी राहों के लिए
फूल चुनती रही चुनती रही चुनती ही रही
