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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
दम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाक
अदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाक
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नूर-जहाँ के मज़ार पर
कैसे इक फ़र्द के होंटों की ज़रा सी जुम्बिश
सर्द कर सकती थी बे-लौस वफ़ाओं के चराग़
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हिण्डोला
तख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमल
जवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बात
फ़िराक़ गोरखपुरी
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हास्य
तू मेहरबाँ हो तो खिल जाए मिरे दिल का कँवल
अपनी बे-लौस मोहब्बत की दिखा दे तासीर
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
ग़ज़ल
दोनों पर बे-लौस मोहब्बत की इक छतरी काफ़ी थी
तुम ने सर पर क्या ताना है दोहरे तिहरे मतलब का
हमीदा शाहीन
ग़ज़ल
करम मौला करे तो आदमी बे-लौस होता है
न हो उस की अगर रहमत तो ये ताक़त नहीं मिलती
आज़िम गुरविंदर सिंह कोहली
ग़ज़ल
मुझ को बे-लौस मोहब्बत के 'एवज़ में 'शम्सी'
हो 'अता ज़ख़्म की सौग़ात तो दुख होता है
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
नज़्म
ज़िक्र-ए-गाँधी
हर शख़्स सर-निगूँ है बड़े एहतिराम से
'आदिल' ये क़द्र होती है बे-लौस काम से
आदिल जाफ़री
नज़्म
इत्तिहाद
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
गंगा
बे-लौस तेरा दामन है दाग़-ए-मासियत से
मौज़ूँ है तेरे क़द पर मल्बूस-ए-पारसाई
सुरूर जहानाबादी
ग़ज़ल
बग़ैर अपने किसी मतलब के उल्फ़त कौन करता है
ये दुनिया है यहाँ बे-लौस चाहत कौन करता है



