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नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
फिर से ''तू कौन है मैं कौन हूँ'' आपस में सवाल
फिर वही सोच मियान-ए-मन-ओ-तू फैली है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मनअ' क्यूँ करते हो इश्क़-ए-बुत-ए-शीरीं-लब से
क्या मज़े का है ये ग़म दोस्तो ग़म खाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
नज़्म
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर
जला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तू
हवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ को
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
आमिर अमीर
नज़्म
घास तो मुझ जैसी है
मेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त था
जो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकें
किश्वर नाहीद
नज़्म
कहना बड़ों का मानो
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
सर-ए-वादी-ए-सीना
फिर दिल को मुसफ़्फ़ा करो, इस लौह पे शायद
माबैन-ए-मन-ओ-तू नया पैमाँ कोई उतरे













