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ग़ज़ल
इक फ़ानूस है जिस में अपनी रूह 'मतीन' सुलगती है
भीगना जब ठहरा तो उसी फ़ानूस के अंदर भीगेंगे
ग़यास मतीन
नज़्म
सावन
रंगीं गुलशन रंगी सहरा रंगी दुनिया रंगी बातें
नाचे खेलें दौड़ें भागें रातों जागें नींदों मातें
नुशूर वाहिदी
नज़्म
ये सराए है
याँ तो हर रोज़ की बातें हैं ये जीतें मातें
ये भी चाहत के किसी खेल में हारा होगा
इब्न-ए-इंशा
शेर
दिल ने हर दौर में दुनिया से बग़ावत की है
दिल से तुम रस्म-ओ-रिवायात की बातें न करो
अब्दुल मतीन नियाज़
शेर
लोगों को अपनी फ़िक्र है लेकिन मुझे नदीम
बज़्म-ए-हयात-ओ-नज़्म-ए-गुलिस्ताँ की फ़िक्र है
अब्दुल मतीन नियाज़
शेर
कभी ख़याल के रिश्तों को भी टटोल के देख
मैं तुझ से दूर सही तुझ से कुछ जुदा भी नहीं
आरिफ़ अब्दुल मतीन
शेर
हम-नफ़स ख़्वाब-ए-जुनूँ की कोई ता'बीर न देख
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
अब्दुल मतीन नियाज़
ग़ज़ल
ग़म-ए-हयात ग़म-ए-दिल निशात-ए-जाँ गुज़रा
तुम्हारे साथ हर इक लम्हा शादमाँ गुज़रा











