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ग़ज़ल
मरिए इस हसरत में गर क़ातिल न हाथ आवे कहीं
रोइए अपने पे ख़ुद गर नौहा-ख़्वाँ कोई न हो
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
ग़ज़ल
मरिए इस हसरत में गर क़ातिल न हाथ आवे कहीं
रोइए अपने पे ख़ुद गर नौहा-ख़्वाँ कोई न हो
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
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कुल्लियात
कहाँ तक काम-नाकाम उस जफ़ा-जू के लिए मरिए
अगर तलवार हाथ आवे तो अपना काम करिए अब
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
अपने ही दिल का गुनह है जो जलाता है मुझे
किस को ले मरिए मियाँ और किसे तोहमत दीजे
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
भला यूँ घुट के मरिए कब तलक दिल ख़ूँ हुआ सारा
जो कोई दाद-गर होवे तो करिए जा के दाद उस से
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
पाँव अपना मेरे सीने पे रख दीजे एक बार
इक लात भी तो मारिए हातिम की गोर पर










