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ग़ज़ल
ख़ुदा है मसदर-ए-मुतलक़ बंदा बी उस सूँ है मुश्तक़
जिधर देखे उधर है हक़ वले पिंदार हाइल है
क़ुर्बी वेलोरी
नज़्म
जो यूँ होता तो क्या होता
ये मसदर इस्म-ए-माज़ी का नहीं है
आप कहिए तो बता देते हैं होने को
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
ग़ज़ल
तफ़्ता-दिल सोख़्ता-जाँ चाक-जिगर ख़ाक-बसर
क्या कहें मसदर-ए-सद-गूना-बला हम ही हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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कुल्लियात
वाजिब का हो न मुमकिन मसदर-सिफ़त सना का
क़ुदरत से उस की लब पर नाम आवे है ख़ुदा का
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ज़िंदा जादू ज़िंदा फ़न ज़िंदा ग़ज़ल ज़िंदा मिसाल
मसदर-ए-महताब है सर-चश्मा-ए-ख़ुर्शीद है
रवेन्द्र जैन
ग़ज़ल
रौशनी ही तो हर इक ज़ीस्त का मसदर है 'मिराक़'
बिन दिखे साँसों में जलता है जो सूरज ही तो है
मिराक़ मिर्ज़ा
ग़ज़ल
हाल माज़ी और मुस्तक़बिल सभी तो उस के हैं
हस्ती अपनी उस की ख़ातिर सीग़ा-ए-मसदर में है











