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ग़ज़ल
न देखेंगे किसी बेताब को वो आँख उठा के भी
कलेजे को मसोसे तिलमिलाए जिस का जी चाहे
आग़ा हज्जू शरफ़
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नज़्म
लौह-ओ-क़लम
हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
है मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाब
वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ज़मीर-ए-पाक ओ निगाह-ए-बुलंद ओ मस्ती-ए-शौक़
न माल-ओ-दौलत-ए-क़ारूँ न फ़िक्र-ए-अफ़लातूँ
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं
राही मासूम रज़ा
नज़्म
शिकस्त-ए-तौबा
सर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गया
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद
राही मासूम रज़ा
ग़ज़ल
हो के मायूस-ए-वफ़ा तर्क-ए-वफ़ा तो कर लूँ
लेकिन इस तर्क-ए-वफ़ा का भी भरोसा क्या है














