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ग़ज़ल
अच्छा मैं हारा तुम जीते आगे की इक बात सुनो
अब के बरस जब बारिश होगी सोच समझ कर भीगेंगे
ग़यास मतीन
ग़ज़ल
मिरी ज़िंदगी मिरी शाएरी है हक़ीक़तों का इक आईना
ये 'मतीन' ग़म जो अज़ीज़ है ये मिरी कभी की तलाश है
मतीन नियाज़ी
ग़ज़ल
जब बशर की दस्तरस से दूर है हब्लुल-मतीं
दश्त-ए-वहशत में फिर इक काफ़िर का दामाँ क्यूँ न हो
जोश मलीहाबादी
शेर
दिल ने हर दौर में दुनिया से बग़ावत की है
दिल से तुम रस्म-ओ-रिवायात की बातें न करो
अब्दुल मतीन नियाज़
शेर
लोगों को अपनी फ़िक्र है लेकिन मुझे नदीम
बज़्म-ए-हयात-ओ-नज़्म-ए-गुलिस्ताँ की फ़िक्र है
अब्दुल मतीन नियाज़
शेर
यही आइना है वो आईना जो लिए है जल्वा-ए-आगही
ये जो शाएरी का शुऊर है ये पयम्बरी की तलाश है
मतीन नियाज़ी
ग़ज़ल
मैं हबीब हूँ किसी और का मिरी जान-ए-जाँ कोई और है
सर-ए-दास्ताँ कोई और है पस-ए-दास्ताँ कोई और है
तारिक़ मतीन
शेर
कभी ख़याल के रिश्तों को भी टटोल के देख
मैं तुझ से दूर सही तुझ से कुछ जुदा भी नहीं










