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ग़ज़ल
तुम्हें आराम ज़िंदाँ में दिवानों इस सबब से है
दिया ज़ंजीर नें शायद तुम्हारे पाँव को सहला
फ़त्तावत औरंगाबादी
शेर
क्यूँ तिरी थोड़ी सी गर्मी सीं पिघल जावे है जाँ
क्या तू नें समझा है आशिक़ इस क़दर है मोम का
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
किया ख़त नें तिरे मुख कूँ ख़राब आहिस्ता आहिस्ता
गहन जूँ माह कूँ लेता है दाब आहिस्ता आहिस्ता
आबरू शाह मुबारक
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ग़ज़ल
क्या रम साँवरे नें 'आबरू' कूँ देख कर पानी
लगा बरसात का मौसम तो देखो यारो चली जामुन
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
सौ गिरह थी दिल में मेरे ख़ोशा-ए-अंगूर जूँ
एक प्याले सीं किया साक़ी नें हल्ल-ए-मुश्किलात
अब्दुल वहाब यकरू
शेर
फ़ानी-ए-इश्क़ कूँ तहक़ीक़ कि हस्ती है कुफ़्र
दम-ब-दम ज़ीस्त नें मेरी मुझे ज़ुन्नार दिया
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
हमें तो रात दिन दिल सीं तुम्हारी याद है प्यारे
तुमन नें इस क़दर प्यारे हमन कूँ क्यूँ बिसारा है
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
अँधेरा आ गया आँखों के आगे ख़श्म सूँ मेरी
जभी उस छोकरे की बुल-हवस नें ज़ुल्फ़ टुक छूई
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
अगर उस ज़ुल्फ़-मुश्क-आमेज़ सें चीनी में बाल आवे
अजब नें इत्र-ए-अम्बर कासा-ए-फ़ग़्फ़ूर सें टपके
आरिफ़ुद्दीन आजिज़
ग़ज़ल
جیکچ ہے سو خدا سوں ہے نیں یھاں کچ میرا بھاتا
جو او منگتا ہے کرنے کوں وہی دل میں میرے آتا
सय्यद शाह बुर्हानुद्दीन जानम
ग़ज़ल
बिकता हूँ ज़र-ए-मेहर हो बाज़ार-ए-वफ़ा में
इन मूलों गिराँ नें हों ख़रीदार के नज़दीक
ईजाद बुरहानपुरी
ग़ज़ल
मत छुपा दिल देख कर ज़ाहिद को शीशे के तईं
नें वो अपने दिल में समझेगा कि मुझ सें डर गया








