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ग़ज़ल
दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच
फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
ग़ुरूर-ए-जेहल ने हिन्दोस्ताँ को लूट लिया
ब-जुज़ निफ़ाक़ के अब ख़ाक भी वतन में नहीं
चकबस्त बृज नारायण
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नज़्म
घर की रौनक़
निफ़ाक़ ओ बुग़्ज़ ओ तअस्सुब के आ गए रेले
ज़बाँ की आड़ में अहल-ए-फ़साद खुल-खेले
रज़ा नक़वी वाही
क़ितआ
फूँक दे जम्अ है जितना ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-निफ़ाक़
क़ल्ब-ए-इंसाँ में मोहब्बत के शरारे भर दे
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
गूँगी इल्तिजा
ये जहन्नम सिर्फ़ निफ़ाक़ और नफ़रत ही नहीं ख़ौफ़ से भी लबरेज़ है
एक दूसरे से ख़ौफ़ अपने आप से ख़ौफ़
मोहम्मद हनीफ़ रामे
ग़ज़ल
ख़ुद ही अदावतों का बीज बोया है आप ने तो फिर
कीना निफ़ाक़-ओ-बुग़्ज़ का उस में समर न आए क्यों
शमशाद शाद
ग़ज़ल
बद-तर ख़िज़ाँ से है हमें इस बाग़ की बहार
बोई निफ़ाक़ फूल में ही ज़हर फल में है














