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ग़ज़ल
मज़ा जो आशिक़ी में है सो माशूक़ी में हरगिज़ नीं
'सिराज' अब हो चुके अफ़सोस परवाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
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ग़ज़ल
जब कहा मैं ने कि नीं बोलते हो गाली बिन
जान ये कौन ज़बाँ है तो कहा तुझ को क्या
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़
शराब-ए-शौक़ का तू ने पिया नीं जाम ऐ वाइ'ज़
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
हुजूम-ए-बुल-हवस के शम्अ-ए-मज्लिस हो सो क्या मअ'नी
लतीफ़ों कूँ रवा नीं इख़्तिलात ऐसे कसीफ़ों सीं
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
मेरे अश्कों की गई थी रेल वीराने पे क्या गुज़रा
ख़बर नीं हज़रत-ए-मजनूँ के काशाने पे क्या गुज़रा
वली उज़लत
शेर
तिरे रुख़सारा-ए-सीमीं पे मारा ज़ुल्फ़ ने कुंडल
लिया है अज़दहा नीं छीन यारो माल आशिक़ का
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
गई नीं बू-ए-शीर उस लब से लेकिन देख वो तल'अत
वही महताब का है आब-ओ-अफ़्सुर्दा हो चक्का है
वली उज़लत
ग़ज़ल
इती ना-मेहरबानी क्यूँ करी नाहक़ ग़रीबों पर
किया क्या हम नीं ज़ालिम अपने जी की बात कह हम सीं
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
शरह-ए-बे-ताबी-ए-दिल नीं है क़लम की ताक़त
तपिश-ए-शौक़ के तूमार कूँ कुइ क्या जाने







