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ग़ज़ल
फला-फूला रहे या-रब चमन मेरी उमीदों का
जिगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैं ने पाले हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिज्र की राख और विसाल के फूल
बाँध कर आरज़ू के पल्ले में
हिज्र की राख और विसाल के फूल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
नग़्मे पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरी
पाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरी
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हिण्डोला
इन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' का
इसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर'
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त
तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
पड़े जब ग़मों से पाले रहे मिट के मिटने वाले
जिसे मौत ने न पूछा उसे ज़िंदगी ने मारा
शकील बदायूनी
नज़्म
आधी रात
भँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चले
कि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पले
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
किस तरह छोड़ूँ यकायक तेरी ज़ुल्फ़ों का ख़याल
एक मुद्दत के ये काले नाग हैं पाले हुए






