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नज़्म
ख़ुदा से कलाम
हम ऐसे निज़ाम को भोग रहे हैं
जहाँ एक की बक़ा दूसरे की भूक पर क़ाबिज़ होने में है
इंजिला हमेश
ग़ज़ल
कमल कटारिया करन
नज़्म
कराची का ट्रैफ़िक
रेस करती हैं बसें शहर के बाज़ारों में
हैं ये सब क़ाबिज़-ए-अर्वाह के औज़ारों में
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
सरसों के खलियान पे क़ाबिज़ अँधियारों के शाकी हैं
मैं तो लहू के दीप जला कर चैन से शब भर सो लूँ हूँ
रशीदा अयाँ
ग़ज़ल
मेरे तसव्वुरात में क़ाबिज़ हो सिर्फ़ तू
हर लम्हा ज़ेहन-ओ-दिल में तू अपना ख़याल दे











