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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
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नज़्म
किसी को उदास देख कर
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
रंज-ए-रह क्यूँ खींचिए वामांदगी को इश्क़ है
उठ नहीं सकता हमारा जो क़दम मंज़िल में है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मिरा रहना तुम्हारे दर पे लोगों को खटकता है
अगर कह दो तो उठ जाऊँ जो रहम आए तो रहने दो
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
माना कि मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर नहीं हूँ मैं
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूँ मैं
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़
रहम कर मुझ पर कि तेरा राज़ कहलाता हूँ मैं














