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ग़ज़ल
मरना मरीज़-ए-इश्क़ के हक़ में शिफ़ा हुआ
अच्छा हुआ नजात मिली क्या बुरा हुआ
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
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ग़ज़ल
ला-मकाँ नाम है उजड़े हुए वीराने का
हू के आलम में है मस्कन तिरे दीवाने का
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
कौन सी वो शम्अ' थी जिस का मैं परवाना हुआ
और फिर लौ भी लगी ऐसी कि दीवाना हुआ
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
हरीम-ए-नाज़ कहाँ और सर-ए-नियाज़ कहाँ
कहाँ का सज्दा किसे होश है नमाज़ कहाँ
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
बताएँ क्या कि आए हैं कहाँ से हम कहाँ हो कर
निशाँ अब ढूँडते-फिरते हैं घर का बे-निशाँ हो कर
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
जो मुहिब्बान-ए-वफ़ा हैं वो वफ़ा करते हैं
कुछ ग़रज़ इस से नहीं कोई जफ़ा करते हैं
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
वफ़ा-शिआ'र को तू ने ज़लील-ओ-ख़्वार किया
जफ़ा-परस्त ये क्या शेवा इख़्तियार किया












