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ग़ज़ल
है वादी-ए-ग़म वो कि गर आ जाएँ इधर ख़िज़्र
राशे से करे हाथ में हज़रत के असा रक़्स
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
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ग़ज़ल
उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
हम भी वहीं मौजूद थे हम से भी सब पूछा किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मंज़ूर था पर्दा तिरा











