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ग़ज़ल
बे-अदा-कारी भी ख़ामोशी से मर जाते हैं लोग
याँ पे कोई खेल मिर्ज़ा साहेबाँ होता नहीं
ख़ालिद हसन क़ादिरी
ग़ज़ल
वो मिर्ज़ा अगले वक़्तों का वो साहेबाँ गुज़रे वक़्तों की
जो करना था वो कर गुज़रे जो कहना था वो कह देखा
फ़य्याज़ तहसीन
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ग़ज़ल
तिश्नगी में लब भिगो लेना भी काफ़ी है 'फ़राज़'
जाम में सहबा है या ज़हराब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़िय्यत-ए-सहबा के अफ़्साने
शराब-ए-बे-ख़ुदी के मुझ को साग़र याद आते हैं
हसरत मोहानी
नज़्म
सफ़र के वक़्त
तुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दिया
मुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
जौन एलिया
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
इश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाक
इश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किराम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लेनिन
मशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान-ए-रंगी
मग़रिब के ख़ुदावंद दरख़्शंदा फ़िलिज़्ज़ात













