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ग़ज़ल
उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग
जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
आख़िर गिल अपनी सर्फ़-ए-दर-ए-मय-कदा हुई
पहुँचे वहाँ ही ख़ाक जहाँ का ख़मीर हो
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
नज़्म
रामायण का एक सीन
दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआ
ख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआ
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
मिटता है फ़ौत-ए-फ़ुर्सत-ए-हस्ती का ग़म कोई
उम्र-ए-अज़ीज़ सर्फ़-ए-इबादत ही क्यूँ न हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
मेरे हुनर में सर्फ़ हुई है तिरी नज़र
ख़ेमा है मेरे नाम का बाला-ए-बहर-ओ-बर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ऐ दिल-ए-बे-ख़बर
वो तो ख़ुशबू था अगले नगर जा चुका
चाँदनी था हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-क़मर
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
इक मुद्दत से फ़ासला क़ाएम सिर्फ़ हमारे बीच ही क्यूँ
सब से मिलता रहता हूँ मैं सब से मिलता तू भी है
फ़राग़ रोहवी
उद्धरण
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
लहू का सुराग़
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
न सर्फ़-ए-ख़िदमत-ए-शाहाँ कि ख़ूँ-बहा देते











